सृष्टि की कथा | Srishti Ki Katha

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Srishti Ki Katha by डॉ. सत्यप्रकाश - Dr Satyaprakash

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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৫১ नि साषप्ट का कथा অনুজ জাত सृष्ठि-सोन्दय्य एक ऐसे स्थल की कल्पना कीजिये, जिसमें प्रेकृति-राशि की प्रचु पता विद्यमान हो, जहाँ सरिता हों, सरोवर हों, ओर कहीं- कहीं पर छोटे-छोटे मनोहर पव॑तों के दृश्यों का भी आनन्द मिल सके । इस स्थल के समीपवर्ती प्रदेश में सघन वनों का समूह हो तो और भो अच्छा है । नेसगिक उपवनों में विहार करने वाले चतुष्पदो पशु रौर उपवन को सुगन्धित पराग को गगन-प्यल में विकीर्ण करने वाले विंग-वृन्द भी जहाँ किलोलें कर रहे हों। यही नहीं, इस स्थल की उस चित्ताकषक कान्ति का भी स्मरण कीजिये जब यहाँ की अनिवंचनोय अतुल सम्पत्ति को देख कर प्रभात-काल में भगवान सूर्यदेव मन्द-मत्द मुसकान से हँस रहे हों और रश्मि-करों द्वारा अपने अतुल वैभव को इस पश्रान्त की शोभा पर निछावर कर रहे हों । इस समय सभो आनन्द में हे, छोटे-छोटे फूल भी हँस रहे हैं, मच्जुल लताएँ भी नव-जीवन प्रोप्र




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