स्वतंत्रता की और | 1341 Swatantrata Ki Aur (1948)

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1341 Swatantrata Ki Aur (1948) by हरिभाऊ उपाध्याय - Haribhau Upadhyay

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हरिभाऊ उपाध्याय का जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन के भवरासा में सन १८९२ ई० में हुआ।

विश्वविद्यालयीन शिक्षा अन्यतम न होते हुए भी साहित्यसर्जना की प्रतिभा जन्मजात थी और इनके सार्वजनिक जीवन का आरंभ "औदुंबर" मासिक पत्र के प्रकाशन के माध्यम से साहित्यसेवा द्वारा ही हुआ। सन्‌ १९११ में पढ़ाई के साथ इन्होंने इस पत्र का संपादन भी किया। सन्‌ १९१५ में वे पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आए और "सरस्वती' में काम किया। इसके बाद श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के "प्रताप", "हिंदी नवजीवन", "प्रभा", आदि के संपादन में योगदान किया। सन्‌ १९२२ में स्वयं "मालव मयूर" नामक पत्र प्रकाशित करने की योजना बनाई किंतु पत्र अध

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जीवन का उद्देश्य २ ; जीवन का उद्देश्य जीव कहांसे जन्मता है और कहां जाता है ? रास्ते से वह क्या देखता है,क्या पाता है वा क्या छोड़ता,क्या करता है-इन सबको जानना जीवन के रहस्य को समझना है। किन्तु इनकी चहुत गहराई में पैठना तर्क- शास्त्र और दुर्शन-शास्त्र के सूच्छ विचेचन से प्रवेश करना है। उससे भरसक बचते हुए फिलहाल हमारे लिए इतना ही जान लेना काफी है कि विचारकों और अनुभवियों ने इस सम्बन्ध में क्य्रा कहा है और क्या चताया है। उनका कहना है कि इस संसार में अनगिनत, भिन्न- भिन्न, परस्पर-विरोधी चौरं विचित्र चीजे है 1 किन्तु उन सवके श्रन्दर ইল एक ऐसी चीज को पाते हे, जो सवे सवदा समायी रहती दै । उसका नाम उन्होने आन्मा रक्ला हैं। यह आत्मा इस भिन्नता और विरोध के अन्दर एकता रखता है। इस दिखती हुईं अनेकता में चास्तविक एकता का अनुभव आत्मा के ही कारण होता है । सांप तना, जहरीला जीव है, फिर भी उसके सारे जाने पर हमारे मन मे क्यो दुःख दौवा है ? शत्र. के भी दुःख पर हमारे मन मे क्यो सहानुभूति पैदा होती है ? इसका यही कारण है कि हमारे और उसके अन्दर एक ही तत्व भरा हुआ है, जो खुख-दुःख ,हष-शोक आदि भावों को, परस्पर विपरीत शरीरों में रहते हुए भी, एक-सा अन्लभव करता है। उसी तत्व का नाम आत्मा है । जब यह तत्व किसी एक शरीर के अन्दर आया हुआ होता है, ततर उसे जीवात्मा कहते है। जब जीवात्मा को यह ज्ञान हो जाता है कि में नास्तव सें महान्‌ आत्मा हूँ, किन्तु कारण-बश इंस शरीरे में आ फँसा हूँ---इसमे बंध गया हूँ और जब चह् इसके बन्धन से छूटकर या इससे ऊपर उठकर अपने महान आत्मत्व को अनुभव करता है, उसमें मिल जाता है,तब वह परमात्मा हो जावा है, या यो कह्दिए कि झुक्भ हो जाता है, सब तरह से स्वतंत्र हो जाता है। इसका सार यह निकज़ा कि परतंत्रता में फैंसा हुआ जीव स्वतंत्रता चाहता है । गभं मे आते ही বর্ধন হীন का वहं प्रयत्न करता है । स्वरततरता उसके जीवन का भयसन- ही नहीं, ध्येय ही नहीं, बल्कि स्वभाव-धर्म है | क्योंकि जीव, अपनी मूल दशा सें स्वतंत्र है। उसी दशा में वह आत्मा है । स्वतंत्र जीव का লাল परमास्म्‌ है और परतंत्र आत्मा का नाम जीव है। इस कारण स्वतंत्रता ज़ीव की प्राकृतिक था चास्तविक दशा है--परतंत्नता, अस्वाभाविक और




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