भारत पुत्री | Bharat Putri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भारत पुत्री | [४ शब्दुर--देवी, सत्य है।यह टूटी भौंपड़ी ओर पुरानी खटिया, हम लोगों के प्रेम की अथाद लहरें, उमडते हुए हमारे লনা কী गोलोक और साकेत का सा आनन्द देती हैं | हम लोग अपे प्रेम सय जीवत में एक राजा से कौत कम हैं ! शीला--राजा, राजा तो महाराज महाद्:खी होता है । केबल वैभव ही सुख का लक्षण नहीं हो सकता । सुख ईश्वरीय देन है जब कि वेभव मनुष्य के खुद के हाथ की करा- मात है | मनुष्य अपने ही हाथ से वेभवशाली बन कर अपना ही बुरा कर लेता है । शक्ए--सत्ती ! फिक्र न करो, उम्हारे इन शब्दों ने शक्कर के कठोर मन को फौलाद्‌ की सस्ती देदी है- वह अब पिघलेगा नहीं । अच्छा, समय मी होने वाला है, जाऊँ राजा के पास, देखें ( एक फटी पगडी सिर पर रख कर नंगे पांव चल पडता है } ) श्यं तीसरा स्थान--राजदरबार ८ दरबारी गण वेढे द । कालिदास महाराज के सिंहासन के निकद दक्षिण पत्त में बेठे मुस्कुरा रहे हैं। ) ; न्लाह्मणु--(परवेश) आशीवोद राजन ! । राजा--(मयसभा के अम्युत्यान देते हैं) नमस्कार वराह्मणद्रेव ! आइये




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