विवेकानन्द साहित्य जन्मशती संस्करण खंड 7 | Vivekananda Sahitya Janmshati Sanskaran Khand 7

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१५ देववाणी इस ससार मे सभी युगो के, सभी देशो के ,सभी शास्त्र और सभी सत्य वेद है, क्योकि ये सभी सत्य अनुभवगम्य है और सभी छोग इन सब संत्यो की उपलब्धि कर सक्ते है! जव प्रेम का सूर्य क्षितिज पर उदित होने लगता है, तब हम सभी कर्मो कौ ईखवरार्पण कर देना चाहते है, ओर उसकी एक क्षण कौ भी विस्मृति से हमे बडे क्लेश का अनुभव होता है। ईश्वर और उनके प्रति तुम्हारी मक्ति--दोनो के वीच कोई भी अन्य वस्तु नही होनी चाहिए । उनकी भक्ति करो, उनकी भक्ति करो, उनसे प्रेम करो 1 लोग कुछ भी कहें, कहने दो, उसकी परवाह मत करो॥। प्रेम (मक्ति) तीन प्रकार का होता है---पहला वह जो माँगना ही जानता है, देता नही, दूसरा है विनिमय , और तीसरा है प्रतिदान के विचार मात्र से भी रहित, प्रेम-दीपक के प्रति पतग के प्रेम के सदृश।' यह भक्ति कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठ है।'' कर्म के द्वारा केवल कर्म करनेवाले का ही प्रशिक्षण होता है, उससे दूसरो का कुछ उपकार नहीं होता। हमे अपनी समस्या को स्वय ह्वी सुलझाना है, महा- पुरुष तो हमारा केवल पथ-प्रदर्शन करते हैं। और 'जो तुम विचार करते हो, वह तुम बच भी जाते हो।' ईसा के श्री चरणों मे यदि तुम अपने को समर्पित कर दोगे तो तुम्हे सवेदा उनका चिन्तन करना हौगा गौर इस चिन्तन के फल- स्वरूपं तुमं तदत्‌ बेन जायोगे, इस प्रकार तुम उनसे श्रेम' करते हौ 1 पराभक्ति और पराविद्या दोनो एक ही हैं।' किन्तु ईश्वर के संम्बन्ध में केवल नानाविध मत-मतान्तरों की आलोचना करने से काम नहीं चलेगा। ईइवर से प्रेम करना होगा और साधना करनी होगी । ससार और सासारिक विषयो का त्याग विशेषत तव करो जब पौधा' सुकुमार रहता है। दिन-रात ईश्वर का चिन्तन करो, जहाँ तक हो सके दूसरे विषयो का चिन्तन छोड दो। सभी आवश्यक दैनदिन विचारों का चिन्तनं ईश्वर के माघ्यम्‌ से किया जा सकता है ! ईश्वर को अपित करके खाओ, उसको अपित करके पिगो, उसको अपित करके सोमो, सवमे उसीको देखो । दूसरो से उसकी चर्चा करो, यह सबसे अधिक उपयोगी है। १ इन प्रेमा भक्तिके रूपो को मरा सावारणी, समजसा तया समर्था कहा गया है 1 २ सा तु कम्ञनयोगेस्योऽप्यधिकतरा \\ नारदभवितसृत्र ॥४२५ १




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