मेरी आत्म कथा | Meri Atma Katha
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
188
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)है, वाहरी दुनिया झाज मेरी सामथ्यं से पीछे है। इस बारे मे बड़े-हो जाने पर मैने
जो कविता रची थी वह मुझे इस समय भी याद है। ^ न পলাশ
हमारी ग्रच्ची का कठड़ा मेरे सिर से भी ऊचा था ।. कुछ सालों बाद में भी
ऊचा हो गया। शव नोकरो का प्रत्याचार ढीला पडा । घरमे एक नर्द् विवाहिता
वहु श्राई । जिससे खाली समय साथी के नाते चार बातें करने का मौका मिला ।
उन दिनो दुपहरी के समय में कभी-कभी गचची पर जाया करता था | उस समय घर
के सभी लोग खाना सा चुकते थे । सब लोगों को घर काम से छुट्टी मिल जाती थी।
जनान खाने में इस समय सब लोगों के लेटने का समय होने से शान्ति रहती थी
कठड़े पर कपड़े सूखने को लटका दिये जाते थे । प्लांगन के एक कोने में पष्ठी हुई
जूठन पर कौचे टूटते रहते थे। इस शान््त समय से पीजरे के पंछी कठड़े की संधि में से
आजाद पंछियो के साथ चोंच से चोच लगाकर झपने मन की बातें किया करते थे ।
जब मैं वहां खड़ा होकर इधर-उधर देखने लगता तो पहले भपने घर के बाग
के उस कोने पर की नारियल के पेड़ो की कतार पर मेरी नियाह पड़ती थी | इस
कतार में से 'बाग' व उसमें बने हुए भोंपडे व होज के पास वाला हमारी तारा!
ग्वालियर का घर दिखलाई पड़ता था | इस दृश्य की उम श्रोर कलकत्ता शहर के
अलग-प्रलग ऊँचाई तथा भ्राकार के कच्ची वाले घर भी दिसलाई पड़ते थे । जिनके
बीच बीच में सिर उठाए हुए पेड़ो की चोटिया पूरवी क्षितिज के कुछ नीले भौर कुछ
भूरे रग मे डूबी हुई दिखाई देती थी । उन पर दुपहरी को घूप का चमचमाता
उजाता भरी पड़ता भौर उसे दःखं उनका रग भी वदलता दिलाई पड़ता था 1 उन
बहुत दूर के घरो के भ्रागे की गच्चियों पर ऊपर से ढके हुए जीने ऐसे मालूम पड़ते
थे मानो वे घर मुर्के अपनी पहली भझंगुली दिखाकर भाखें मिचकाते हुए भीतरी
रहस्य का पता दे रहे हो +
जिस तरह एक भिखारी राजमहल के सामने खड़ा होकर यह खयाल करता
है कि इस महल के भण्डार धर में कुबेर का धन जमा और सुरक्षित है, उसी तरह
इन झलजान घरो में मुझे तो झाजादी लीला का धन भरा हुआ मालूम होता था,
उसका खयाल भी मैं न करता था । उस समय पर सिर पर सूरज के तपते रहने पर
भी पझ्ाकाश में खूब ऊंचाई पर घीलें उड़ा करती थी। जिनकी कानों में कड़बाहट
भरने वाली आवाजें मेरे कानो के पर्दों को हिला देती थी । बाग से लगी हुई गली
से सूने और चुप्प घरो के श्रागे से फेरी लगाने वाले मनिहार' की चूड़ियां लो घूड़िया
की दुपहरी की नींद को तोड़ने वाली झ्रावाज भी मुझे सुनाई देती थी । इन सव बातो
से मेरी श्रात्मा नीरस संसारसे दूर उड़ जाती थी ।
मेरे पिता घर पर बहुत कम कभी कभी रहते थे । वे हमेशा दौरा ही करते
रहते थे । तीसरी मजिल पर उनके सोने बंठते के कमरे थे। मैं ऊपर जाकर1 बचपन : 15
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