रजत शिखर | Rajat Shikhar

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutSri Sumitranandan Pant
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
146
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about श्री सुमित्रानंदन पन्त - Sri Sumitranandan Pant
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)रजत शिखर
( कोयल की कक )लो, जीवन की नव॒ मजरित प्रथम वसंत सी
प्राण सखी आ रही इधर ही, राह भूल कर !
या गत स्मृतियों से प्रेरित हो ? कोयर उसका
अभिनंदन करता हुं उत्सुक ममं कूक भर!
वुह, कुह,--लहरो-से उठते स्वरावेश में
मेरे प्राणो को उत्कठा बरस रही हें!मंघो के अंबर में शशि की रजत तरी ज्यों
तिरती स्वप्नो सेरगरग कर रिखर फेन के,
मेरे प्राणों मे उतराती प्रेयसि की स्मृति
निज किशौर लोला का चचरू मुग्ध हास्य भर !
विरल जलद से स्वणं बिम्ब सा उसका स्पदित
गौर वेक् हं सतत फलक उठता स्मृति पट मे !
आज उतर आईं वह ज्यों साभार धरा पर
नव मधु की इच्छाओं के पंखो में उड़ कर !( दूर से प्रवाहित गीत के स्वर )नत्र वसत क्या लाया ?
प्राणो को घाटी मे फिर
फूलो का पावक छाया !सुन कोयल का दाहक कूजन
मयुपो का उन्मादक गृजन,
स्वप्नो ने अतर् ममर भरकंसा गीत जगाया !१९
User Reviews
No Reviews | Add Yours...