हिंदी विश्वकोश [सप्तदश भाग] | Hindi Vishvakosh [Part 17]

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Book Image : हिंदी विश्वकोश [सप्तदश भाग] - Hindi Vishvakosh [Part 17]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मश्यप्रभतूरि-मलयालि मलयप्रमसूरि-एक जैनसूरि। इन्होंने मानतुड्भसूरिक्रत सिद्धशयन्तकी टीका चिली है । उक्त दीका ११६० विक्रम संवत स्वी ग थी। परयमूमूत्‌ ( स'० पुऽ ) मखयपवेत । प्रढयभूति (स० त्लो०) हिमाहुय-पर्वतस्थ स्थानमेद, हिम्ता- ठयक एक प्रदेशका त्ताम । मलयराज्ष-एक प्राचीत कवि | । प्रठूयवाद ( स'० पु० ) मलयानिठ, मछय पचतकी ओरसे ৷ अनिघालो वायु । | मरुयवासिनी ( से स्रो७ ) दुर्गा । ( हरिवश १०२४५ ' | महया (स० स््री०) मल कयन-टाप्‌। १ लिवूता, निसोथ | २ सोमराजी | ३ चकुधी | प्रलयागिरो ( ० पु9 ) मलयगिरि देखो । मररयाचल म्ब प्रदेशके सह्याद्रि-पदेतवा प्क अ'शए । स्कन्दपुराणके मलेयाचल-खर्डमं यहाके देवतोर्थादिका विषय सविस्तार लिखा है | मलयाचल ( स* पु० ) प्रतदश्वासावचलश्चेति | मलय पचत | छन রি রি #>ूनन्‍> 2 >ा9 नमन -~-----~ 1 1 | “ुतरागनागकखीरृतो पके तत्मित्‌ रहे कमहरेणबरुणे शयीत्‌ ) यत्राहतानिल्विकम्पितपृप्पदाम्नि हेमन्तविन्ध्यहिमतरन्मलयाचलानाम्‌ ॥ (গর ওহ ४७ अ ) मलयाद्रि ( स'० पु० ) मल्यपव॑त | महयाननद्सरखती--एक विख्यात परिडित | आप णङ्कर चायके म्तपोषक थे और आायायेरुपप्रें उक मतका प्रचार छर गये हैं । मानिक ( स ५ पुण ) प्रसयस्य अनिलः । १ वसेन्त- लीग वाथ, वसन्तकालो हवा । पर्याय -चासन्त । त एव रमिः कालः स एव मलयानिद | বম किन्तु मनोऽनयदिव इत ॥7 ( गाहित्वदर्पण २११२६ ) २ छुगन्धित वायु । ३ महयपरंतको ओरसे आमेवालो वायु, दक्षिणको बायु। मलयालम--भारतवर्पके दृ्षिण परिचि अवस्थित एक देश । वह चन्द्रणिरिसे कुमोरिका अन्तरीप অন্ধ জি है। इसे केरल भी कहते ह । भख देखा | ----- ~ ---~- ----~ २३ हिग्दूशाखमें लिखा है, कि परशुरामने समुद्रसे इस स्थानका उद्धर क्रिया था! पछि मिन्न मित्र समयमें मिनन भिन्न राज्नाने उस परर अधिक्रार जमाया | शङी- कटके अधिपति, कानपुरकी वेगम, हिवाड्ोरके राजा, पुत्त गीज्, ओलन्दाज, फरासी और टोपू না ये सब क्रमशः केरलके अधि/वर हुए थे | वत्तेमान समय- में यह एक एकमात बृ्थि-गर्षमेए्टके अधीन है। पयार प्रायः समो स्थान पर्वतमालासे परिपृण है। वीच बोचमे उपत्यका भो देखो जावो है। तामिल भाषा- में मलय शब्दका अर्थ पच्चत और अलम शब्दका अर्थ उपत्यका है। इसी कारण इसका ताम्रिल नापर भया लम्‌ हुआ है। इसे केररू भो कहते हैं । केरल नाम- की उत्पत्तिके सललन्धमे कोई विशेष प्रमाण नहीं मिलता, पर कोई कोई 'केरम' अर्थात्‌ नारिकेल (नारियल) शब्दसे केरल नाकौ उत्पत्ति वतरते है । फिर किसी किसी का कहना है, कि केरठ सामक यहां एक प्रवरू राजा राज्य करने थे । शायद्‌ उन्हीके नााुसार उस प्रदेशका नाम केरल रखा गया होगा | यहाक्े प्रधान अधिधासो नायर जातिके है। थे छोग मलयाल श्र नामसे भी प्रसिद्ध ই | प्रतयालम हन- का सापा हैं। किन्तु तामिल भाषाका भी प्रचार देखा ज्ञाता ह। भारतके अन्यान्य प्रदेशेसे भा आय और अनाये जातिके नाना सम्प्रदाय इस स्थानमें आ कर वस गये हैं। ये छाग साधारणतः कवाड़ो, गुजराती, हिन्दु, स्तानी आदिमें वोलचाल करते हैं एतड्धिन्त यहा मापिला नाप्त पक श्रणोका मुसलमान भो रहता है | भरवदेशसे जिन सव मुसरमानोंने पहछे महवारमे उपनिवेश वसाया था, उन्हीं औरस और पलवारों रमणीके गर्मसे जो सन्तान उत्पन्न हर्‌ घं 'मापिस्छा কভার | माका सथं प्रत्ता भौर पिकः अर्थं पुत्र ट, अतः मापिरछ का अथं माका पुत हेता है | माविद्ठा जाति वहुत वलिष्ठ और साहसो है। मलयालि-दाक्षिणात्यधासो एक पहाडो जाति | खेती- चारो और पशुपालन ही इनको एकमात्र उपज्ोषिका है। वहुतेरे शेवारय पहाइके उपत्यकास्थित ्रामोमे रहते हैं। छुना जाता है, कि थे छोग ११वों অহী कचचिोपुरसे यहां




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