दो राहें | Do Rahe

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१३ | दो राहुंहताश हो बोल उठे-- धन्य है भारत की नारी, वह भी ब्राह्मण कन्या और उस पर कान्यकुष्ज ! पता नहीं यह भारत कहाँ जाएगा |” दपरमानन्द और चन्द्रप्रकाश दोनों हँस पड़े और रघिया अपनी धुनमें मन्दिरकी ओर चल पड़ी ।हँसीका दौरा जब शान्‍्त हुआ तो परमानन्दने कहा--- अबे चन्द्‌ जब में रधिया की ओर देखता हूँ तो तेरे आगे सिर मेरा स्वयं झुक जाता है । अगर तू उसका साथ नहीं देता तो कमल जैसी कोमल रघिया का पता नहीं ._ क्या होता ?” |“पदम भैया, में तो दीदीसे छोटा ही था, मैंने जो कुछ किया मेरा कतेंव्य ही था । पर तुमने क्‍या कुछ कम किया है बड़े भाईके रूप में ! और फिर भया में तो सगा भाई था, मुझे करना ही पड़ता लेकिन तुम. . .! ”“क्या मतलब ? क्‍या में रधियाका सगा भाई नहीं हूँ ? अरे रधिया जब सात वर्षकी थी तबसे मुझे राखी बाँध रही है और तू कहता है. . . --कहूते हुए उन्होंने चन्दूके कान पकड़ने के लिये भ्रपना हाथ बढ़ाया ।हाद, भई आप उसके बड़े भाई हैं मानता हूँ... मानता हूँ ।” और बन्‍्दू हाथं जोड़ कर खड़ा हो गया । दउन बढ़े हुए हाथोंकों परमानन्दने रोका नहीं ग्रलबत्ता कान पकड़नेके बदले उसके दोनों हाथ पकड़ कर उसे समीप खींच लिया-- बैठ-बैठ, भागा कहाँ जाता है £परमानन्द, चन्द्रप्रकाश और रघधिया चन्दोल ग्राममें ही जन्मे थे । चन्दोलके खेतों श्रौर गलियोंमें इनका बचपन जवान हुआ । जब परमानन्दकी माँ मरी तब चन्दू और रधियाकी माँ ने उसे अपनाया था और तीनोंमें उम्रमें' बड़ा होनेके कारण वह 'पदम भेया' कहलाता | वैसे पदमके परिवार और चन्दूके परिवारमें कोई रिब्तेदारी नहीं थी । सम्बन्ध था तो केवल इतना कि दोनों एक ही ग्राम के वासी थ । चन्दू कान्यकुब्ज ब्राह्मण तिवारी परिवारके थे ग्रौर पदम सरयूपारी ब्राह्मणके मिश्र परिवारके ।दोनोने प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँवमें प्राप्त की । फिर चन्दू दिल्लीके एकं स्कूलमे भरती कर दिया गया और .पदम वहीं गाँवमें रह कर वैक




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