विदिशा - वैभव | Vidisha-vaibhav

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Vidisha-vaibhav by राजमल जैन - Rajmal Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विदवज्जन ! यह क्षेत्र ऐसे अनुपम साहित्य से भरा पड़ा है। यदि सुञ्ञे शासन समाने,र्थिवा किसी संस्था का सहयोग मिरे तो ठेखक : - | नई खूबी नई आदत, नये अरमान पेंदा कर । तू अपनी खाक से, इक दूसरा इन्सान पेदा कर ॥ इस नाशवान शरीर से ऐसी अनुभूतियां हमारे देश के लिये मिलतीं 1 प्रास्त का तथा राजधानी और संस्कृति का दूं भाग्य हैं कि कोई भो सबंधित शिक्षासंस्थायें ओर उनके संचालकों का ध्यान इस और नहीं है। यदि है तो केवल लक्ष्पी जी को और सरस्वती को महती कृपा का अनुचित ढंग से काम विकारादि में उपयोग किया जा रहा है। आत्मज्ञान के साधन अध्यात्म की ओर नहीं है। वैसे हमने इसमें यह विवेचन किया है कि राम कौन है भौर रावण कौत हैं। आध्यात्मिक रामायण देखें पृष्ठ १६ पर। ऐसी पुण्य भूमि :-- तेरी खुनी तेरी इज्जत, तेरा इकबाल दूना हो । तू ओरों फे लिये, नेकी का नमूना हो ॥ इसी भावना को लेकर विधाता ने मुझे जम्म दिया नौर इस कतंव्य को पूरा करने की जिज्ञासा रखता हूँ। सर्द मेदां देखते हैः मदे मेदां कौन है । पर जनाने झाँकते हैं, मेरी गुइयाँ कौन है ॥ घष्य है उन वीतरागी पुरुषो को जिष्टोनि :- साया ठगनो ने ठगा, यहु सारा संसार । पर भाया जिनने ठगी, उनको बहु बलिहार ७ यदि सरस्वती हैं तो उसकी बहिन लक्ष्मी दासी बनकर प्रतिक्षण चरणों में लोटेगी। यदि सरस्वती का साथ नहीं, कुमता से नेह छगा तो गाँठ की भी चली जावेगी । पाठकगण यह भी ध्यान रखे कि - जितने भी तीर्थकर हुए है क्षत्रियों में से ही हुये | इस्हीं की मान और मर्यादा कौ जो आज जैन कहलाते हैं कुबेर की तरह रक्षा कर रहे हैं। धर्म कोई ऐसी वस्तु नहीं जो दूसरों (मूर्खो) की निखा से अपवित्र हो जावे। यह भी ध्यान रखें कि श्रीमान आई०जी सा० पुलिस विभाग श्री रुस्तम जी ने लेखक का पुरातत्वीय निजी संग्रहालय देखा और दिनांक २-७-५९ को अपनी सम्पत्ति भी प्रदान की है । जोकि दशक पुस्तिका पृ०५पर है। पुलिस के वरिष्ठाधिकारों जौर अश्याग्य अधिकारी वें किसी भी उत्तम कार्य में हाथ इसलिये नहीं बटाते कि उसमें स्वाथसिद्धि नहीं हये पाती । |




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