हिन्दी गद्य के विविध साहित्य - रूपों का उद्भव और विकास | Hindi Gadya Ke Vividh Sahitya Rupon Ka Udbhav Aur Vikash

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Hindi Gadya Ke Vividh Sahitya Rupon Ka Udbhav Aur Vikash by बलवन्त लक्ष्मण कोतमिरे - Balvant Lakshman Kotmire

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१० हिन्दी गद्य का विकास और उर्द गद्य की इस प्रकार की प्रारम्भिक रचनाओं द्वारा हिन्दी का प्रारम्भिक कथा-साहित्य प्रभावित रहा है। खड़ी बोली गद्य आजकल जिस भाषा में हिन्दी गद्य लिखा जा रहा है वह खड़ी बोली का ही गद्य >| खडी बोरी के उद्गम के बारेमे विद्वानों में कोई निश्चित मत नहीं मिलता। पंडित रामचनद्र शुवल के अनुसार खड़ी बोली गद्य का आरम्भ सोलहवीं शताब्दी से माना जाता है। अकवर के समय भें गंग कवि ने “चन्दछंद बरतत की महिमा” नामक गद्य पुस्तक खड़ी बोली में लिखी थी।”! डा० तराचंद भी शुक्लजी के इस मत से सहमत हैं। किन्तु आधुतिक शोधों के अनुसार इसकी प्रामाणिकता संदिरध है। इस ग्रंथ की भाषा का 'नमूना इस प्रकार मिलता है-- सिद्धि श्री १०८ श्री श्री पातसाहिजी সী दलपतिजी अकबरसाहिजी आमखास में तख॒त ऊपर बिराजमान हो रहे। और आमशुलास भरने लगा हूं जिसमें तमाम उमराव आय आय कुर्वि बजाय जुहार करके अपनी बेठक पर बेठ जाया करें अपनी अपनी शिसल से। जिनकी बंठक नहीं सो रेसम के रघ्से में रेसम की लभे पकड़ पकड़ के खड़े ताजीम में रहे। इतना सुत्र के पातसाहिजी क्री अकबरसाहिजी आद सेर सोचा मरहर दास चारन को दिया। इनके डेढ़ सेर सोना हो गया। रास बंचना प्रन भणा। आभंखास बरखास हुआ। “चंद-छंद बरनन की महिमा के समान खड़ी बोली का कोई अन्य ग्रंथ सबहवीं शताब्दी में नहीं मिक्ता । परन्तु डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सन्‌ १७४० ई० तक खड़ी बोली श्ूद्य के अस्तित्व पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है} उनको शान्ति निकेतन के विद्याभवन में हिन्दी से संबंधित दो किताबें, मिलीं। ये दोनों पुस्तकें महा- महोपाध्याय वररुचि की लिखी हुई पत्रकौमुदी हैं। दोनों बंगला लिपि में लिखी हैं। इनमें एक पुस्तक तो अपूर्ण है और दूसरी पूर्ण। दोनों का रचनाकाल शायद आसपास काही है। डा० द्विवेदी ने २०० वषं पुरानी खड़ी बोली के पत्रों के नमूने नामक' लेख में नमूने के लिये पत्रों के पाँच नमूने भी दिये हैं। उस लेख से एक पत्र नीचे ভুত है-- १--पं० रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी सहित्य का इतिहासः छठां संस्करण, संर ২০০) ও ४५९ | २--पं० राम॑चन्द्र॒शुक्ल; हिन्दी साहित्य का इतिहास'छठां संस्करण,-सं० २००७, पुऽ ४२०१




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