पुष्प पराग सटीक | Pushp Parag Sateek

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Pushp Parag Sateek by कविवर टेकचन्द्र जी - Kavivar Tekchandra Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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&भावार्थ--एक स्त्री वृक्ष से उतरी, उसका जन्म माँ से नहीं हुश्रा है। उससे उसके पिता का नाम पूछा तो उसने अपना आधा नाम “निम्ब! बताया, मैंने जो उससे उसका अपना नाम पूछा ते वह अपना नाम कुछ न बोली, श्रयवा उसने श्रपना नाम बोली? बता दिया ! पहले श्राई हुई “निबोली? की पहेली के समान इसमें भी सब्र वातें घय्ती हैं। :श्याम वरन और दाँत अनेक, लचकत जैसी नारी। दोनों हाथ से 'खुसरो' खींचे और कहूँ तू आरी॥ (आरी) शब्दार्थ--श्याम = काली । घरन = रंग } अनेक = बहुत-से । सरलार्थ-खुखरो कदते ई कि एक वस्तु एेखी दै जिस का रंग काला है, बहुत से दाँत हैं श्रौर स्त्रियों की तरह लचकती है | खुसरो कहते ६-श्रारी श्रथात्‌ अरी तू इधर आरा । इसका उत्तर श्री? बताया गया है। आरी काले रंग की है, उसके कई दाँत होते हैं श्र वह स्त्रियों कीतरह लचकती चलती है । लकड़ी को चीरते हुए लोग उसे दोनों हाथों से खींचते हैं |. पौन चलत षद देह वदाव, जल पीवत बह जीव गेधातै। है वह प्यारी सुन्दर नार, नार नदीं पर है वह्‌ नार ॥ (आराग) शब्दा्थ--पौन = दवा । दैद = शरीर । ' भावाथे-- एक वस्तु ऐसी है, जिसका शरीर हवा के चलने. पर॒ वड जाता है और पानी पीते ही वह मर जाती है वह बड़ी प्यारी सुन्दर नारी , है] इसका उत्तर “श्राग! दिया गया है | आग इवा चलने से बढ जाती और पानी पड़ने पर बुक जाती है। _फारसी बोली आई ना, तुर्की ही. पाई ना। - ~ হিন্দী बोली आरसी आए, 'खुसरो? कह्टे कोई न बताए ॥ (आरसी) - -शब्दार्थ--ाहना = शीशा 1 श्रारसी = शीशा ।




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