आत्मिक साहचर्य | Aatmik Sahcharya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आत्मिक साहचयें यह तक दिया था “हमें अपने मतभेदों को स्वीकार करना चाहिए। हम दोनों एक ही इश्वर को सेवा करने का यतन कर रह हैं, आप अपने तरीके से और में ईंरवरीय तरीकं से ।” यह दृष्टिकोण अभी भी प्रचलित है । अपनी कथा-कहानियों पर संतोष करके, जो विज्ञान की अवहेलना करते हं ओर नैतिक सिद्धान्तो के प्रतिकल मांगों तथा मानवता की ऐसी आवश्यकताओं को चेतना के कारण धमं से मुक्त होकर मानव का अहंकारी मन एसी शन्यता की प्रतीति करने लगा है, जिसे बढ़ता हुमा ज्ञान ओर मानवतावाद पूरा नहीं करपा रहे हु । धमं कं बन्धनो को तोड़ फेकनें के उतावकर्पन मं हम एक एसी दमनकारी दासता कं शिकार बन रहं ह्‌, जिसे धर्म-निरपेश् व्यापक ज्ञान ने हमपर थोपा ह ! यदि लखो- करोड़ों लोग आज उन्माद कौ स्थितिम्‌ यदि पागरुखाने आधे भरे हं यदि मानसिक उपचारकों कौ मांग बढ़ती जा रही है, यदि ऊब उठने की भावना और शमक पदार्थ आज बहुतों के साथी हैं, तो यह इस बात का दयोतक हुं कि जीवन मे आदद तथा ध्येय के स्थान पर रिक्तता विराजमान ह्‌ 1 * हम अपने आन्तरिक ओौर बाह्य जीवन कं भेदो पर पार पाने के लिए धमं के विभिन्न रूपों को अपनाते हं । इसका कारण स्वाभाविक अकर्मण्यता ओर अन्धविश्वास ह । हम इतने आलसी होते ह्‌ कि आत्म-निरीक्षण ४, देखिये सी. जी. युंग. का कथन--- पिछले तीस वर्षो से ससार के समस्त सम्य देशों के लोगों ने मुझसे परामशे किया है। सेरे रोगियों में से जोबन के आधे उत्तरकाल में अर्थात्‌ पेंतीस साल से ऊपर एक भो ऐसा नहों, जिसकी समस्या अन्तिम उपाय के रूप में जीवन में धामिक दृष्टिकोण को प्राप्त करने की न रही हो । यह कहना ठीक होगा कि उनमें से प्रत्येक इसलिए बीमार हुआ, क्योंकि उसने वह वस्तु खो दी जो प्रत्येक युग के जीवित धर्मों ने अपने अनुयायियों को प्रदान की थी और वास्तवं मं उनम से कोई भो अपने धार्मिक दृष्टिकोण को पुनः प्राप्त न करने के कारण अच्छा न हो सका ।” --सॉडने सेन इन सर्च ऑफ़ हिज़ सोल' (१९३३)




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