चरक मासिक पत्रिका | Carak Masik Patrika

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चरक मासिक पत्रिका... १६ अग्नि मुख रस (वि, र:)--इस रस मे मीठा तेलिया मिलाया जाता है । ग्रजीणं+ उदर बूल, भ्रजीणं से उत्पन्न ज्वर, पमन में इसका श्रच्छा उपयोग होता है। मात्र[-- १ से ३ र० तक। जीण कण्टक रस (भें. २.)--इस रस में भी मीठा तेलिया पड़ता है । गुर अग्नि मुख रस के समान ही हैं | मात्रा-- १ से ३ र० तक । अमीर रस (वे. जी,)--यह रस उपदंश में विशेष रूप से उपयोगी है.। उपदंश की किसी भी अवस्था में एवं उपदंश जन्य बातरक्त, गठिया में लाभदायक है।मात्रा $ से १ ० तक। ,. , + अश्वकचुकी- रस (वै, सा. सं.)-इस रस में विशेष रूप से मीठा ` तेलिया श्रौर अमाल गोटा भिलाया जाता है अतः भ्रजीरं, ग्रुल्म, बद्धकोष्ठ, ज्वर में लाभ करता है। मात्रा--१ से ४ र० तक । अश कुठार रस (र. ' रा. सु.)--इस रसायन के सेवन से अर्श् में अच्छा लाभ होता है। दस्त साफ होता है । मस्सों की पीड़ा जाती रहती है । मात्रा-~ २ र० से १ माशा तक | अश्विनी छमार रस (अनु. त.)--पित्त प्रधान ज्वर, मैलेरिया, विषम ज्वर, उदरवायु, मूत्रक॒च्छ, उदर शूल, और अतिसार में अत्यन्त उपयोगी है । मात्रा--१ र० से २ र० तक । । अम्लपित्तान्तक रस (र, गा. सु.)--श्रम्लवित्त) वमन, हृदय दाह में बहुत लाभ करता है । मात्रा-- १ मा० । आनन्द भैरव रस (लाल) (रसेन्द्र) (ज्वरातिसारे)-इसके सेवन से श्रतिसार मरोड़, पेचिश, ज्वर युक्त अतिसार, उदर शूल और भ्रजीणं सम्पूर्ण रूप से दूर होते हैं । मात्रा-- १ से २ 'र० तक । श आनन्द भैरव रस (काला) (र. रा. सु.) (कास अधिकार) --खांसी श्वास, जुकाम, नजला तथा कास युक्त ज्वर में इस रसायन का अच्छा उपयोग होता है | मात्रा-१ सेर र० तक। श्रामवातार रस \वटी)(मै. र.) -जोड़ं का ददं, ज्वर, गछिया, भ्रादि वायु रोगों में इसके सेवन से अच्छा लाभ होता है । मात्रा-- १ से २,९२० तक । च्मारोम्य वर्धिनी (वटी) (र. र. स.)--अजीर्ण, पुराना व नया कब्ज, मालावरोध से होने वाला ज्वर) उपद्रव स्वरूप अन्य उदर विकारो में लाभ पटियाला फांसी सरहिन्द, जबलपुर, 'नालतन्धर देद्रामाद्‌ को याद्‌ रं ।




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