स्वर्ण - जयन्ती - ग्रन्थ | Svarn-jayanti-granth

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भी अ° भा० श्वे० स्था० जन-धमे, साहित्य व तत्त्वज्ञान का सं० परिचय १९ शक के आय 9-49-94 9-4-49 9-44-49 9-4-46 कक § ~आदि क्लेश मद होकर भी अपना प्रभाव दिखलाते रहते हैं । तीसती भूमिका है परमात्म । इसमे रागद्रेश ऋ पृं उच्छेद होकर वीतारागत्व प्रकट होता दे ।लोक-विद्यालोकविद्या में लोक के स्वरूप का बेन दै। जीब-चेतन और अजीव-अचेतन या जंड़ इन दो तत्त्वो का सहचार ही लोक है। चेतन-अचेतन दोनों वत्त्व न तो जिसी के द्वारा कभी पढा हुए हैं और न कभी नाश पाते हैं फिर भी स्वभाव से परिणामान्तर पाते रहते हैं। ससार काल में चेतन के ऊपर अधिक प्रभाव डालने वाला द्रव्य एकमात्र जड़-परमागुपु ज-पुदृगल है, जो नानारूप से चेतन के सबध मे आता है और उसकी शक्तियों को मया दित भी करता है। चेतन-तत्त्व की साइजिक और मौलिक शक्तियां ऐसी है जो येग्य दिशा पाकर कभी न कभी उन जड़ द्रव्पों के प्रभाव से उत्ते मुक्त भी कर देती हैं । जड और चेतन के पारस्परिक प्रभाव का क्षेत्र ही लेक है और उस अभाव से छुटकारा पाना ही लोकान्त है। जन-परम्पप की लेकक्षेत्र विषयक कल्पना साख्ययोग, पुराण: ओर बौद्द आदि परम्पराओं की कल्पना से अनेक अशों में मिलती जुलती है।जैत-परम्परा न्‍्यायवैशेषिक की तरह पसमाणुवादी है, साख्ययोग की तरह ग्रकृतिवादी नहीं है तथापि जन-परम्परा समत परमाणु का स्वलप साख्य-परन्पत-सप्रत प्रकृति के स्वल्प के साय जसा मिलता है बसा न्यायवरेषिक-# समत परमाणु स्वरूप के साथ नह मिज्ञता, क्योंकि जत समत परमाणु साख्य समत प्रकृति की तरह परिणामी है,न्यायवैशेपिक समत परमाएएु की तरद टस्य नहीं है। इसी लिये जले एक ही सांख्य समत प्रकृति গুলী জনतेज, वायु आदि अनेक भौतिक सृष्टियों का उपादान बनती है बसे द्वी जन यमत एक दी परमाणु परथ्वी, जल, तेजआदि नानारूप मे परिणत होता है। जन परम्पण न्वायवेशेषिक की तरह यह नदीं मानती ऊि पार्थेव, जज्ीयआदि भौतिक परमाणु मूल में ही सद्दा मिन्‍न जतीय हैं। इसके सिवाय और भी एक अन्तर ब्यान देने योग्य है।बह यद कि जन समत परमाणु वेरोषिक समत परमाणु की अपेक्षा इतना अधिक सूच्म है कि अन्त में बह सांख्यखमत भ्रति जेखा दी अव्यक्त वन जाता है। जन-परम्परा का अनन्त परमाएुवाद भाचीन सांख्य समत पुरुष -बहुत्वानुरूप प्कृतिबहुत्ववाद से दूर नहीं दे ।जेनमत और ईश्वरज्ञन-परंपरा सांख्योग भीमांसक आदि परपराओं की तरह लोक को प्रवाद्‌ रूपसे अनादि चौर अनत ही मानती है । वह पौराणिक या वेशेषिक-मत की तरह उसका सृष्टि-सहर नहीं मानती । अतएवं जन परपरा भ कर्ता हतो रूप से ईश्वर जेते स्तत्र व्यक्ति का कोई स्थान दी नदीं है । जन सिद्धान्त कहता है कि प्रत्येक _ जीब अपनी-अपनी सृष्टि का आप ही कतों है। उसके अनुसार तास्त्िक ष्ट से प्रत्ये जीव मे दैश्वरमाव द জী मुक्ति के समय प्रकट द्वोता है। जिसका इश्वस्भाव সত हुआ है वही साधारण ल्लेगों के लिए उपास्य बनता है । योगाशत्तर समत ईश्वर भी मात्र उपास्य है। कर्ता-सहतां नदीं, पर जन और योगशास्त्र की कल्पना में अन्तर है । वह यह कि थोगशास्त्र-समत सदा सुक्त होने के कारण अन्य पुरुषों से मिन्‍न कोटि का है, जबकि जनशास्त्र समत ईश्वर बसा नहीं है। जैनशास्त्र कहता है कि प्रयटनसाष्य होने के कारण हर कोई योग्य-साधन इश्वरत्व लाभ करता- है और सभी मुफ्त समानमाव से इश्वररूप से उपास्य हैं।




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