कनक - रेखा फूलों का गुच्छा भाग - 2 | Kanak Rekha Fulon Ka Guchchha Bhag - 2

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Kanak Rekha Fulon Ka Guchchha Bhag - 2  by केशवचन्द्र गुप्त - Keshavchandra Gupt

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चार्ली बाबा । ॐ इस बार तो अदालतका सनाया कुछ टूट सा गया। उपस्थित जन एक दूसरेका मुँह देखने लगे | जज साहबके मुखपर वही गम्भीरता थी । सच्ची बात निकालनेका विजयगव जरूर उनके मुँहपर चमक रहा था । इस मुकदमेम यदि वे ठेटीको न देखते, तो शायद शहादतका इतना अच्छा विष्छेषण न कर सकते । उन्दोनि जो कुछ कहा उसमे उनको जरा मी सन्देह नहीं था उन्होंने खूब सोच समझकर कहा था कि मरे साहबकी स्वाभाविक मृत्यु हुईं है। वे फिर जूरियोंसे कहने लगे-यदि कोई गला दबोच कर मेरे साहबकी हत्या करता, तो उनके शरीरपर उसके निशान जरूर मिलते | मरे साहबने स्नान करनेके लिए जब डुबकी থাই थी उस समय ऊपरसे यदि कोई उनको दाब रखता, तो वह आत्म- रक्षाके लिए जरूर छटठपटाते | टबकी ऊँचाई पाँच फीट थी | वह मेरे साहबकी छाश मिल- नेके समय जलसे ऊपर तक भरा हुआ था | सिर्फ तीन इंच खाली था | यदि हम यह मान लें कि आसामी इतना जबर्दस्त है कि वह मेरे साहबको ऊपरसे बहुत देर तक दांब रह सकता है-ते बेशक उसको दोषी कह सक्ते है । आपमेसे अनेकने मरे साह- बको देखा है । आसामी भी आपके सामने खडा है-इसको एक मार गौरसे देखिए । मार्कोनी साहबके जन्मसे छाखों वर्ष पहले आँखेंकी बिजलीके प्रभावसे छोग बिना शब्दके बातचीत करना जानते थे । जज साहबकी बातोंका मतरूब ढैली और माताबदल कुछ भी नदौ सम- झते थे । वे एक दूसरेकी ओर एकटक नजरसे देख रहे थे | इस भावपूर्ण कठाक्षका मतलब कौन बता सकता है ? दोनोंकी आँखोंसे




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