ऋग्वेद | Rigved
श्रेणी : धार्मिक / Religious, हिंदू - Hinduism
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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
20.15 MB
कुल पष्ठ :
985
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)द १६:
होते । संहिताओं के पद पाठ बहुत उपयोगी हैं । पदपाठ का निर्धारण भी एक विद्या
है। उदाहरण के लिए 'मेहना' पद को लिया जा सकता है। ऋग्वेद ५1 ३६1 है और'
सामवेद ४, २1 १। '४ में यह पद पाथा जाता है । यास्क ने दानार्यक “मंह' घातु से
इसे एक पद मानकर इसका अर्चें “मंहनीय' किया है । परन्तु यास्क ने ही इसमें तीन
सदों का संपोग एक पद माना है । वे हैं मेज-इह--न जिनका अर्थ है कि “जो मेरे
पास इस लोक में नहीं है। इसी प्रकार ऋग्देद १० ! £1 १ में 'वादो' पद आया
है 1 यास्क ने इसकी व्याख्या करते हुए पदकार शाक्त्य को आलोचना की है । यारक
का कथन है कि शाकल्य ने जो वाज-यः पदच्छेद किया है वह ठीक सही । क्योकि
यदि ऐसा होता तो 'न्पघायि' क्रिया को पाणिनि के सुबर ८1 है । ६६ के अनुसार'
उदात्त हो जाता । परन्तु ऐसा न होकर यह है अनुदाज्त 1 दूसरा दोष यह आता है कि
मन्त्र का अर्य पूरा नदी होता है । अतः “वाप:' एक पद माना जाना चाहिए । ऐसी
स्थिति में बाय: का अर्थ दे: -4-पुषः अर्थात् पक्षी शिशु होगा । इस प्रकार पद पाठ के
चविपय में बड़े सूदम विचार है।
वेदों के चार उपबेद हैं । आयुर्वेद, अर्थवेद, धनुवंद और गन्पदंदेद 1 यहा
पर वेद पद का प्रयोग विधा के लिए है । इसके अनन्तर भाते हैं बेदाद्धु । वेद के छ'
अज्भ हैं । में हैं-शिक्षा, कप, व्याकरण, छन्द:, निरुक्त और ज्योतिष । नेदा्थ के
लिए इनका परिजन आवश्यक है । वेदाज़ों के बाद उपाज्धी का नम्बर आता है
वर्तमान मे सांख्य, योग, दंशेपिक, स्याय, मीमासा और बेदास्त नाम से छः.
उपाड़ पाये जाते हैं । ये ही छः दर्शन हैं । ये दार्शनिक विचारों के आकर ग्रन्थ हैं।
बेदी वी फिलासोफो इनमे पाई जाती है । उपाज़ नाम इनका इसलिए है बयोकि ये
अज्धों से निकते हैं । यहा पर प्रश्न उठता है कि ये क्सि अज्ध के उपाज़ है। व्याकरण
छन्द, उपोतिप, निरुक्त और शिक्षा से साक्षात् सम्बन्ध तो इनका पाया नहीं जाता
है | रहा केवल “क्र जिसके ये उपज हो सकते हैं 1 गल्प शास्त्र मंत्रों के विनियोग'
ग्रयोग, कतैव्य, आदि से सम्बन्ध रखते हैं । ये गृह्म, श्रीत और घमें भेदों वाले हैं ।
सुषमा कर्मों का दिधान करने वाले यू हासुतर है । थौतकर्मों यज्ञयागादि के विधायक श्रौत
सूभ हूँ । वर्णाश्रिम धर्म और विदिघ चत्तेब्यों या विधान करने वाले धर्मसूपर हैं ।
कतेंड्य का विधान बिना सत्ताविशान के हो ही नहीं सकता है। धर्म जहां सनुष्य के
धरम का धोतक है वहा पदार्थों के धर्म का भी च्योतक है । स्मृतियों के आधार थे
'र्मसुत्र हैं । मनुस्पूति बा आधार भातव घर्मसू्र है । घरमंसूत्रों में कर्तव्य वो विवंचना
के साथ जगत, जीव और भगवान् बे भी दिवेचन पाया जाता है । बतः ये घ्मेंसत्र
उपाड्धों के आधार हैं और इन्हीं से उपाज्धों का प्रादुर्भाव हुआ । स्मूतियो वा कप र्थ्प््ि
के लर्थ का स्मरण दिलाना है। अतः स्मूतियों वर भी बेद के अभे यरने में सहयोग हद ह
ि शाखाएँ बेदो के ऐसे थ्यास्पान हैं जो सभी 'बरणी के पारपदों ने सुविधा के
लिए मन्तरों के फंरफार से बनाये हैं ।. द्ाह्मण प्रस्थ भी मेद के व्याह्यान हैं । थे बटुधा
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धर्मरक्षक-Dharmrakshak
at 2021-07-02 21:35:23"ऋग्वेद के मंडल के नाम लिखे "