उन्नीसवीं शताब्दी का अजमेर | Ajmer In Ninteenth Century
श्रेणी : इतिहास / History

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
302
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)ऐतिहासिक सन्दर्भ ११मीमरहीसुनाषा। स् १८०५ वालाराव ने भ्रवानक भिनाय पहुंच कर यहां के
ठाऊुरों से भपनी हैसियत के झनुसार भेंट देने को कहा | उन्हें दाध्य किया गया कि
मे ६०,००० रुपये की राशि प्रदात करें । परन्तु बालाराव एक पाई भी वसूल करने
में अ्रतफल रहे । भिवाय फे राजा ने इस शर्ते पर कि बालाराव उसके जामा में से
एक चौयाई माफ कर दे तो फौज सर्च देवा स्वीकार क्रिया 1०१1उपयुक्त विवरण से स्पष्ट है कि मराठो को जब भी धन की प्रावश्यकता होती
राजस्व के नियमों की परवाह किये बिना ही वसूली के लिए चल पड़ते थे । इस तरह
बार-बार घन की माग बने रहने से क्षेत्र का सम्पूर्ण राजस्व प्रशासन प्रब्यवस्थित हो
भया या। उस पर फौज खर्च झौर थोपा गया जिससे भूरयाजस्व में बड़ी भारी कमी
झ्रागई थो। बालाराव ने जालोीया से फौज खर्च के नाम पर ३५,००० रुपये का
फर प्रजमेर शहरपनाह की मरम्मत व खाई की खुदाई के नाम पर वसूल किया।
उसने फौज खर्च के झलावा मुसद्दी सर्च भी वसूल |किया। मयूदा से ३५,०००,
देवलिया से १५,००० व भिणाय से ३५,००० पये फौज खच के नाम पर वक्त
किए गए। इस तरह के वित्तीय दंड भार दिनो दिन बढ़ते जाते थे इस कारण
ধন १८१० में जब तातिया प्रजमेर का सूबेदार नियुक्त हुम तो उसने एक लाख की
रकम की माग की परन्तु वह केवल ३५,००० रुपये की राशि ही बटोर पाया था।
पह माग उसने इस झ्ाघार पर को कि उसे भ्जमेर की सुबेदारी पाने के लिए एक
भारो रकम रिश्वत में देनी पड़ी थी । भगर कोई इस्तमरारदार उनकी माग पूरी गहीं
करता तो उसके ठिकाने पर झोक्रमण किया जाता था। सब १८१५ मे बडली के
ठाकुर द्वारा भुगतान से इ'कार करने के कारण उसके ठिकाते पर प्राक्रमए किया
गया। ठाकुर अपने कतिपय सगे सम्बन्धियों सहित सारा गया झौर उसका ठिकाना
लूट लिया गया ।७२ मराठा प्रशासन वास्तव में संगठित लूट था जिसमें कतिपय
भ्रदुचित कर वसूली से दवकर”३ गरीब किसान दरिद्रता की चरम सीमा तक पहुंच
गया था ।५४४अजमेर जिला भजमेर और केकडी को मिलाकर बनाया गया था। जिन््हें
किशनगढ़ पृथक् करता था । जागीर इस्तमरार व भौम में विभाजित होने के कारण
यहां लालसा अथवा सरकारी राजस्व भूमि बहुत ही कम थी । जागीर दान तथा
बरुशीश के भ्रस्तग्गंत ६५ ग्राम थे तथा उसका वापिक भू-राजस्व एक लाख के लगभग
था। इनमे सबसे महत्वपूर्ण जागीर ख़्वाजा साहिब की दरगाह वी थी, जिसमें १४
गाव ये व उनसे २६,६३० रु० की भु-राजस्व ग्राय होती थी । অন্য জ্রীতী আমীর
कुछ व्यक्तियों भ्रौर धाक सस्थानो से सम्बद्ध थं जौ विशिष्ट व्यकित, देवस्पान
क्था प्रयम श्री भौर डितीय थे णी के उमरावों को मेंट में दी हुई थीं 1९४?इसतमरार जागीरें ६६ थीं जितमें २४० प्राम थे शौर इनका क्षेत्रफन
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