ऋग्वेद संहिता सप्तम अष्टक | Trigved Sanhita Vol 7

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
9 MB
कुल पष्ठ :
249
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)५७ सटीक ऋण्वेद्-सेहिता [ 9 अ, & म०, १ अध्या०, २ अनु०५४ सुत्त
पवमान सोम दैश्रता । अवस्छार ऋषि । गायत्री छन्द् |
अध्य प्रलामनु य॒ तं शकर दुदुहे अहयः । पयः सहलसामृषिम् ॥१॥
अयं सूयं इवोपहगयं सरांसि धावति । सत प्रत आ दिवभर् ॥२॥
अयं तिद्वानि तिष्टति पुनानो भुत्रनोपरि । सोमो देवो न सूयः ३॥
परि णो देववीतये वाजां अषसि गोमतः । पुनान इन्दविन्द्रयुः ॥४।पी
५५ सूत्तपव्मान सोम देवता | झचवत्सार ऋषि | गायश्री छन््द् ।यवयव॑ नो अन्धसा पुष्टंपुष्ट परिखत्र सोम विद्वा च सोभगा ॥१॥
इन्दो यथा तव स्तवा यथा ते जातमन्धसः ।नि बर्हिषि प्रिये सदः ॥२॥
उत नो गोविददववित् पवस्व सोमान्धसा । क्षुनमेभिरहभिः ॥३॥१ क्रि रोग इन मोमङ़्े प्राचोन, प्रकाशमान, दीप्त, अक्तौम, कर्म-फरदाता और स्रवणशील
रखको दृहते है !२ यह सोम, सूयके सम्तान, सारे संनारकों देखते है' | यह तीस दिन-रातकी ओर जाते हैं
यह स्व्रगंलें ले कर सातों नदियोंकों घेरे हुए है ।३ शोधित किये जाते हुए यह सोम, सूर्यदेवके समान, सारे भुवनोंके ऊपर रहते है' |४ सोम, इन्द्राभिकाषी और शोधित तुम हमारे यज्षके लिये गोयुक्त भन्न चारो ओर
गिराओ । ५०.१ साम, तुम हमारे लिये प्रचुर यव (जो), अन्नके साथ, दो और सारे सौमाग्यशाली घन भी दो |२ सोम, भन््नरूप तुम्हारे स्तोन्र और प्रादुर्भाषकों हमने कदा ! भव तुम हमारे प्रसन््नता-
दायक कुशपर बेठो ।१३ सोम, तुम हमारे गौ भौर अश्वके दाना हो । तुम अल्प दिने ही भन्नकरे साथ क्षसिति होभो ।
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