नैषधीयचरित में रस-योजना | Naishadhiyacharit Me Ras Yojna

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Naishadhiyacharit Me Ras Yojna by रविदत्त पाण्डेय - Ravidutt Pandey

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रथम खण्ड प्रथम अध्याय रस-योजना रस-मिद्धान्त भारतीय चिन्तन-परम्परा कौ अमूल्य देन है । अनको कृती भारतीय कात्यत्व मीमासकौ ने रस स्वरूपं तथा उसङ़े विभिन तत्त्वो कं विवे. चन में अपने समय तथा श्रम का उत्मगं कर रमसिद्धान्त तथा उसकी अनुगति को सुज्ञेय बना दिया है 1 परन्तु यदि किसी कृति की समीक्षा आधारभूत सिदधा-त के परिप्रेक्ष्य मे की जाती हे तो उसके ओऔचित्य युक्त बने रहने की मभावना अधिक रहती है। अत नंपबीयचरितगत रस योजना पर प्रकाश डालने के पूव रम तत्त्वों तथा रसस्वरूप पर सक्षिप्त दृष्टिपात कर लेना असमुचित न होगा। रस तत्त्व -- भरत मुनि ने रस सूक्ष--विभावानुभावव्यभिचारि्तयोगात्‌ रस निष्पत्ति -- मे प्रत्यक्ष रूप से केवल तीन रस तत्त्वो का निर्देश किया है। परन्तु विभिन्‍न रसो के लक्षणों का निर्देश करते हुए उहाने स्थायी भावो, सात्विक भावों तथा विभिन्‍न प्रकार की प्रकृतियो का भी अनेक रसो के लक्षणों मे उल्तेख क्या है। यद्यपि स्थायी भावादिको को विभ वादि के अन्तगत गतार्थ किया जा सकत! है ओर इसी लिए भरत ने रस सूत्र में इनका पृथक्‌ उल्लेख नहीं किया है। परन्तु यह तत्त्व विभावादिको से यव्किचित रूप में भिन्‍न भी अवश्य होत हैं। भरत ने स्वय भी इस तथ्य को स्वीकार कया है। अत विभिन रसो के लक्षणों में निदिष्ट होने के कारण तथा विभावादिकों स यत्किचित्‌ रूप में भिन्न होते के कारण स्थायी भावादिको को भी रस तत्त्वो के माम से अभिहित किया जा सकता है। दरवर्ती विवेचक्रो न भरत का हो इस तिषय मे अनुगमन क्या है । यदि किसी स्वतत्र चिन्तक ने उपयुक्त तत्त्वो मे से किसी एक या दा तत्त्वो को ही रस परिपोप के लिए आवष्प्रक स्वीकार भी किया तो विद्वत्समाज में उसे मान्यता नही प्राप्त हो सकी । फिर भी प्राय सभी चितको ने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है कि विभावादिको में से किसी एक तत्त्व की योजना भो यदि प्रधान रुप से की गकहोतो रय प्रनीति करा सक्ती है 1 परन्तु ठेते प्रकरणो को स्पष्टतया अनि- दिप्ट तत्वों सेन तो सर्वेधा विहीन ही समझा जाता है और न उस प्रतीति को




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