प्रबोधसुधाकर | Prabodh Sudhakar

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Prabodh Sudhakar by मुनिलाल - Munilal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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লিল इआ दै, फिर भी मनुष्य बाहरसे इसपर अगरु, चन्दन ओर कपूर आदिका लेप करता है ! यत्रादस्यपिधत्त खामाविकदोषसडूगतम्‌ । ओपाधिकगुणनिवह प्रकादायञ्छाघते मूढः ॥२३॥ मृढ पुरुष इसके खाभाविक दोर्पोको यत्पूर्वक छिपाता है, और औपाधिक ( ऊपरी ) गुणोको प्रकट करता इआ इसकी प्रशंसा करता है । क्षतमुत्पन्नं देहे यदि न प्रक्षाल्यते त्रिदिनम्‌ । तत्रोत्पतन्ति बहवः कृमयो दुर्गन्धसद्भीणों: ॥२४॥ शरीरम यदि थोडा-सा धाव हो जाय ओर उसको तीन दिन मीन घोया जाय तो दरगन्धकरे कारण उसमें बहुत-से कीडे पड जाते हैं । यो देहः सप्तोभूत्सुपृष्पशय्योपशोभिते तल्पे । सम्प्रति स रज्जुकाष्टेनियन्त्रितः क्षिप्यते वह्नीं ॥२५॥ देखो, जो शरीर अति खुशोमित फ्रलोंकी सेजपर छुखपूर्वक सोया हुआ था वह अब रस्सी और काठसे जकड़ा जाकर अभ्निमे फेंका जा रहा है ! सिहासनोपविषटं दृषा य॑ मुदमवाप लोकोऽयम्‌ । त॑ कालाकृष्ट तनुं विलोक्य नेत्र निमीलयति ॥२६॥ ঙ




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