व्यष्टि अर्थशास्त्र एक परिचय | Vysti Airthshstra Aik Perichey
श्रेणी : अर्थशास्त्र / Economics

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
8 MB
कुल पष्ठ :
185
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)हम अगले अध्यायों में बाजार पर आधारित
अर्थव्यवस्था में इन केंद्रीय समस्याओं को समाधान
विधि का विस्तार से अध्ययन करेंगे।वैसे इन समस्याओं के अधिक सीधे (प्रत्यक्ष)
तरीके से समाधान भी संभव हैं। 1970 के दशकव्यष्टि अर्थशास्त्रप्रचलित केंद्रीय आर्थिक आयोजन व्यवस्था के माध्यम
से इन सभी समस्याओं का समाधान वहाँ की सरकारें:
करती थी।” इसका विवरण क्लिप 1.1 में दिया जा
रहा है। बाजार व्यवस्था की तुलना में केंद्रीय आयोजन
व्यवस्था की त्रुटियों का ब्योरा हम क्लिप 1.2 में दे
रहें हैं।तक पूर्वी यूरोपीय तथा सोवियत संघ आदि देशों मेंটি क्लिप 1-1केंद्रीय योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था ( परीक्षा अनुपयोगी). , ..;
कद्रीय रूप सै अर्थव्यस्था मर सरकार के ही एक विभाग के रूप मे एक केंद्रीय योजना प्रधिकरण या. आयोग गदित कियो
जाता है। यही विभाग तय करता दै कि देश मे किसी निश्चित अवधि (एक वर्ष या पाँच वर्ष) मे किन वस्तुओं का ओर
कितना उत्पादने ओर उपभोग करिया जाएगा। उत्पादन ओर उपभोग के ये पूर्वं निर्धारित स्तर “लक्ष्यों की. भांति होते है
आयोजन अधिकारी देश में समग्र रूप से वांछनीय सवृद्धि भौर विकास युक्ति का निर्धारण कर उसके अनुरूप उत्पाद
और उपभोग आदि के लक्ष्यों का निर्धारण करते है। कुल उत्पादन का लक्षय निधौरितं करके उसे तिभिन कारखानौं कै
बीच बाँट दिया जाता है। यह तय कर दिया जाता है कि उस कुल उत्पादन मे किस कारखाने का कितना अंशदान होगा। |
एक और बात पर ध्यान दें क्रि किसी एक वस्तु (साइकिल) के उत्पादन के लिए कई ओर चीजौ की जरूरत होत्री
(जैसे इस्पात, रबंड आदि)। इन अन्य चीज़ों का उत्पादन और अनेक चीजों के प्रयोग पर निर्भर रूता है। इस प्रकार ' क्या
(उत्पादन हो) की समस्या का समाधान करने वॉली केंद्रीय प्रायोजन व्यवस्था एक साथ समन्वित रूप से हजारों वस्तुओं '
के उत्पादन संबंधी निर्णयों से बंधी विराट प्रक्रिया का रूप धारण कर लेती है। सरकार ब्वारा 'प्रत्यक्ष' रूप से 'क्या' के
प्रश्न के समांधान की येही विधि रही है! प्रत्यक्ष होते हुए भी इसे बहुत ' आसान मान लेना उचित नहीं होगा। |
` 'कैसे' (उत्पादन हो) की समस्या के समाधान का आधार यही है किं सभी कारखाने सरकारी है ओर उत्पादनं विधि,
( मन विषय में जो निर्णय योजना आयोग कर ले उन्हें उन्हीं का पालन करना होता है। यही है 'कैसे' के प्रश्न का सरकारी समाधान |
सभी संपत्तियों पर सरकारे का अधिकार होता है। सरकार हौ सभी प्रकार की योग्यतां ओर कौशल आदि से संपन्न
लोगों के बेतन आदि निर्धारित करती है। इस प्रकार से किसके लिए का प्रश्न भी सरकार दुबारा ही निपटा दिया जाता |
है। दूसरे शब्दों में सभी केंद्रीय समस्याओं का सरकार दवार प्रत्यक्ष रूप से अपने आदेश जारी करने के अधिकार का |
कर 'समाधान' कर दियां-जाता है। इसीलिए केंद्रीय प्रायोजित अर्थव्यवस्थाओं का दूसरा नाम ' निदे्चित अर्थव्यवस्था,
अर्थात् सरकारी निर्देशों पर आश्रित॑ अर्थव्यवस्था भी है।1
> ५५ धः
¢ ॥ 1 | (107 वैसे वास्तव में विश्व में कोई भी अर्थव्यवस्था शत-प्रतिशत रूप से न तो बाजारेन्मुखी होती है और न ही केंद्रीय रूप से
आयोजित। सामान्यतः बाजार की शक्तियो ओर सरकार के नियमन का पिलाजुला रूप दिखाई पड़ता है। यदि दोनों का योगदान
समान प्रायः हो फिर हम अर्थव्यवस्था को मिश्रित अर्थव्यवस्था का नाम दे देते हैं। यदि सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र की
गतिविधियां प्रधान हों तो उस अर्थव्यवस्था को केंद्रीय आयोजन वाली अर्थव्यवस्था कहा जाता है (उदाहरण : पूर्व सोवियत
संघ)। जिन देशों में निजी क्षेत्र के क्रियाकलापों की प्रधानता हो उन्हों हम बाजारोन्युखी या बाजार पर आश्रित फँजीवादी
अर्थव्यवस्था कहते हैं (उदाहरण / संयुक्त राज्य अमेरीका, जापान)।
भारतीय अर्थव्यवस्था 1970 के दशक वक तो पूरी तरह से मिश्रित अर्थव्यवस्था ही थी, पर उसके बाद से यह धीरे-धीरे
बाजारोन्युखी स्वरूप धारण कर रह है। आज यह 1960 और 1970 के दशकों की तुलना में बहुत कम नियंत्रित रह गईं
है। अतः निजी फर्म बहुत 'उदारतापूर्ण' वाह्वरण में काम कर रही हैं।
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