लाटी संहिता | Laati Sanhita

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Laati Sanhita  by प. हीरालाल शास्त्री - Pt. Heeralal Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शारौसहिला ५ केकलेनएरिनिना ककय मिधितेन धतेन वा \ उत्ितान्नं न भुझ्लोत पिशिताश्ननदोधजित्‌ (३३ तश्रातिकालष्यत्रस्वे वरिणासगुणतथा | सम्मृष्छर्चन्ते ऋसा. सुकमा नेपा सविदद्य १३४ छाकपन्ाणि सर्वाणि লাইলি कदाचन \ भावकेर्मासबोधस्य वजंनार्थ प्रयत्मत- ।।३५ वश्रावश्यं जरसा सूदमा कचितःपुदषिगोखरा । न त्यजन्ति कदाचित शोकपनत्राभयं मनाक्‌ ॥३१ तश्मादर्मािना नू नमात्मनो हित मिच्छता \ जाताम्हूक वर स्यास्य च्रावकेदशंनास्वितेः ५३७ रजन्यां सोजन ध्याज्य नेप्टिकेवतधारिभि । पिशिताहनदोधस्य त्यायाय भहडुश्यसे ४३८ मनु रात्रिभुकतिस्दप्ो नत्रोहेऽदस्र्वया क्वचित्‌ \ दष्ठसलकविक्यातप्रतिमायामास्ते यत ५३९ सस्य सर्वात्मना तत्र निक्ामोजनवजं नम्‌ । हलो किन्त्वत्र दिग्मात्र सिद्धं स्वानुभवागसात्‌ ॥४० अस्ति कथ्िद्िश्षेषोऽत्र स्वत्पाभासोऽथंतो महान्‌ । साकिलिरोऽत्र दिम्मात्रे तत्रातोखार्जिता ॥४१ भो ब्रती श्रावकोको ग्रहण नही करना चाहिये । जिन पदार्थोंकी शोध लेनेपर भो बहुत सा कारू बीत यया है, मर्यादासे अधिक काल हो गया है उनको फिर अपने नेत्रोसे देख-शोधकर ग्रहण करना चाहिये ॥३२॥ जो रोटो, दाल आदि पदार्थ केवक अग्निपर पकाये हुए हैं अथवा पूड़ी कचौरी आदि गरम धीमे पकाये हुए हैं भथवा परामठे आदि पदाथ घी और अग्नि दोनोंके सयोग से पकाये हुए है ऐसे सब प्रकारके पदाथं मास-मक्षणके दोषोको जाननेवाले श्रादकोको दूसरे दिन बासी नही खाना चाहिये ॥३३॥ इसका भौ कारण यह है ज्रि कासी भोजनमे मर्यादासे बाहर काल वीत जाता है इसलिये उनमे इस प्रकारका परिणमन होता है जिससे कि उनमे सुक्षम ओर सम्मृर्च्छन एसे त्रस जीव उत्पन्न हो जाते हैं जो इन्द्रियोसे दिखाई नहीं पढ़ सकते, ऐसे सूक्ष्म त्रस जीव कैवल सर्वज्ञदेवके द्वारा प्रतिपादन किये हुए शास्त्रोसे ही जाने जा सकते हैं ॥३४॥ श्रावको- को प्रयत्न पूवक मासके दोषोका त्याग करनेके लिये सब सरहकी पत्तेवाली शाक भाजी भी कमी ग्रहृण नही करना चाहिये अर्थात्‌ मेथी, पालक, चनाकी शाक, बथुजा, चौ रा जादि परीवाले शाकं भौ नही खाने चाहिये ॥३५॥ क्योकि उस पत्तेवाे शाकमे सूक्ष्म त्रस जीव अवक््य होते है उनमेसे क्रितने हौ जौवतो दृष्टिगोचर हाते हैं, दिखाई पडते है ओर कितने हो दिखाई नहीं पढ़ते, परन्तु वे जीव किसी समयमे भी उस पत्तेवाले शाकका आश्रय थोड़ा ला भी नही छोडते ॥३६॥ इसलिये अपने आत्माका कल्याण चाहनेवाले धर्मात्मा जीवोको पत्तेवाले सब ज्ञाक तथा पानतक छोड देना चाहिये और दर्शन प्रतिमाकी धारण करनेवाले श्रावकीको विशेषकर इनकात्याग कर देना चाहिये ॥३७॥ ब्रत धारण करनेवाले नैष्ठिक श्रावकोको मास-भक्षणके दोषोकात्याग करने- के लिए बहुत बड़े उद्यमके साथ रात्रिमे भोजन करनेका त्याग कर देना चाहिये ॥३८॥ कदाचित्‌ कोई यहाँपर यह शका करे कि आपको यहापर मूल गुणोके वणंनम रात्रि-मोजनके त्यागका उपदेक्ञ नही देना चाहिये क्योकि राज्ि-भोजनका त्याग करनेवाली छठी प्रतिभा है। छठी प्रतिमाके অর্গল, में इसके त्यागका वर्णन करना चाहिये। इसके उत्तरम कहा है कि यह बात ठीक है परन्तु उसके साथ इतना और समझ लेना चाहिये कि छठो प्रतिमामे तो रात्रि भोजनका त्याग पूर्ण रूपसे है और यहाँपर मल गुणोके वर्णनमे स्थूल रूपसे रात्रि भोजनका त्याग है। मूल गुणोमे स्थल रूपसे भी रात्रि भोजनका त्याग करता अपने अनूमवसे भी सिद्ध है मौर आगमसे मी सिद्ध है ॥३९-४०॥ यहाँपर मुलगुणोके धारण करनेमे जो रात्रि भोजनका त्याग है उसमे कुछ विशेषता है } तथां वहू विशेषता मालूम तो थोड़ी होती है किन्तु उसको अच्छी त्तरह समझ लेनेपर वह विशेषता बहुत बड़ी मालूम देती है। सामान्य रीतिसे वह विशेषता यह है किं मूलमुणोमे जो रात्रि मोजनका




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