चित्रलेखा | Chitra Lekha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दतीय परिच्छेद कुमारणिरि योगी थ। / योगी * हाँ, बथोषकि उस संसार छोड दिया था। क्यों है एक दूसर) नरपना। कल संसार भा्त करने के लिए, इस आशा पर कि नहू संसार सुख से पूर्ण होगा । जनरव से उसे अर थी. कल्पना का मण्डल उसके निचरने का कोने या । संसार में उसे शाति ने थी, इसीलिए शास्ति को पाने के लिए उसे चिजंन की शरण लेगी पढ़ी थी। संयम गौर विवम इत पर उसे विश्नास था, इच्छ।एऐ उसके वशीसूत थी । योगी चुमारणिर्ि में शक्तियाँ थी थी। पर नह उन शक्तियों का सचय करने में ही वि्नास करता था, अयोन करने में नहीं। ७ुकान्ते में उज्तका मन स्थिर रहता था, गौर एकोग्रचित होकर नहूं अम्थास भी कर था। उसने अपना शरीर तप दिया था; पर उसको केण्८ न हुअआ। था। शरीर तपते। था; पर उसको जलन के एक अलौकिक सुख की कल्प कीरलि कर देती थी। उत्तयें को वी दिया था क्योकि वासनाओ के कारण ही मपुष्य पाप करता हैं। योगी, कु्ारणभिरि चुली था विचारनसागर में वहू डूबी रहता थे; उसके इच्छाओं का संसार न था और इच्छाओ के न पुर्ण होने से जनित परित्ा।प न था। उसके जीवन की अकमंण्यता पर रच और विचार का जोावरण या। चुख कल्पना हैं. है। प्यास ने होने के कारण तृप्ति का कोई नाइ्तविक ने भी ही, ५९ ऐसी स्थिति में हुदथ ५९ कोई भार नही. रहता, कर्क की टीस की अनसिज्ञते। श्धान होती है। दुख से शूष्य तथा हुलके-से हइथ को के में ले जान। होता रे




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