कुञ्ज | Kunj

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Kunj by श्री जयनारायण झा - Sri Jaynarayan Jha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( २) लगन लगा चातक सा मुझ दुिया का हे सवसव महान | अन्तिम भीख यही जीवन की, दे दो करुणा स्नेह निधान | ( ३ ) मोर सरिख घनश्याम तुम्हे मै, देख ररह हो चत्य बिभोर। में रुरा रगा पाऊं, तुम, को- सर्वत्र सदां सब ओर ॥ ( ४ ) यथा केवकी रज में गज, अलि-- प्राय्ल रज्ञ भें रहते लिप्त । तथा सुमे भी तुम अपने पद्‌- रज़ में हो होने दो तृप्त ॥




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