जैन व्रत कथायें | Jain Vrat Kathayen

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Jain Vrat Kathayen by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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९५ हुआ था । यह देखकर शुणधर डर गया किन्तु फिर उसने थोड़ी हिम्मत की ओर हाथ जोड़कर नागराज से कहा-नागराज | या तो आप मेरी दराँत छोड़ दें वरना आप घुझे! भी उस लें क्योंकि इसके जिना वापिस घर नहीं जा सझता ॥ - इस प्राथना पर स्वग में धरणेन्द्र का आसन 'कंपायमान हुआ। अवधिज्ञान से गुणधर को, छुसीबत सें जानकर धरणेन्द्र ने. उसकी सहायता के लिये पद्मावती को भेजा: ১ ৩ খু न 11 ) ६ ) पद्मावती ने बालक के सामने प्रगट होकर बरूत सी सम्पति दी ओर उससे कहा कि मय मत करो | पाश्णनांथ स्वाधी छा संदा स्मस्शकसे ओर रविवार के दिन वत किया करो: इतता कहकर पद्मावती अन्तर्ष्यान होगे :, 2০7 5০10 दो ঈদ मैनो गुणधर सम्पत्ति पाकर बहुत हित हुआ ओर घर जाकर >अपन - भाईयों को., सारी . कहाती कह सुनाई | भाई भी बहुत ह्पित हुये. ओर धर्म में दत्त चित्त हकरं प्रत्येक रविषार फो व्रत करने लगे,




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