भीष्म- प्रतिज्ञा | Bhisham Pratigya

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Bhisham Pratigya by श्रीलाल खत्री - Shrilal Khatri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दर महाभारत वन ना खड़े हुऐ आ सभा में, सीघे सरल सुभाय । देखा चारों ओर को, दृष्टी तनिक घुमाय ॥ देखा, वह सभा मनोहर है, मणिमय खंभे हैं खड़े हुऐ । मन हरण दृष्य गिरि नदियों के, दीवारों पर हैं बने हुऐ ॥ मणियों की कान्ति रत्नों का तेज, लख चकाचोंध सी आती है । जिस तरफ दृष्टि जा पड़ती है, बस यहां अटक रह जाती है ॥ एक तरफ अमीर उमराओं में, है क्षात्रतेज चमचमा रहा । और तरफ दूसरी सुनियों में; है. ब्रह्मतेज दमदमा रहा ॥ भूपति के लिये मध्य में इक, कंचन से जड़ा सिंहासन है । जिसके समीप ही रस्न जटित, सगचम सहित गुरु आसन है ॥ महाराज परिश्चित के सुपुत्र, जन्मेजय अति छवि छाये हुये । सिंहासन पर हैं टिके छुसे; मंत्रियों सहित हथांसे हुये ॥ उन्नत लिलाट, आजान याहु, ऐश्वयवान शोमित यों | मानों बैठे हें घिरे हुये, महाराज इन्द्र सुरगणों में उयों ।' के च्यासदेव का जब लग्वा, अति तेजस्वी रूप | उछे समासदगण सहित, इन्द्रपस्थ के भूप ॥ आगे आजा तुरत प्रणाम किया, आर प्रजन अच प्रदान किया । फिर गुरु आसन पर विठलाया, सब प्रकार से सन्मान किया ॥ इसके उपरान्त कुचल प्रूछी, फिर वोले किम जागमन हुआ | हे नाथ छुक्म है कया. खुझको, दान कर चित्त प्रसन्न ॥ यथा योग्य सन्मान से, हुये सुनि नाथ । आशिवाद॒ प्रदान कर, फरा सिर पर हाथ ॥ कौरव पांडव यंश में, रहा न कोइ वीर 1 पुत्र तुम्हारा वच रहा, केवल एक शरीर ॥ मु हि




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