भक्तमाल सटीक | Bhaktmal Satik

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Bhaktmal Satik  by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भक्तमाठ सटीक ! ( ९) रिमन इनके स्वरूप में अनपले दिखाये हैं ॥ जिनकेनअश्वुपात- पुठकितगातकदूंतिनहूं को भावासेछवोरेसोछकायेहें । जोलोरहेदू रिरहे विमुखतापूरिहियोहोयच्रूरिचूरिनेकुश्रवणलगायेहें ॥ ४ ॥ पंचरससोईपंचरंगफूठथाकिनीके पीकेपहराइवेकोरबिकेवनाईहे । बेजयंतीदामभाववतीभलिवाभानामछाई अभिरामश्याममतिरूल- चाईहे ॥ धारीररप्यारीकिहृंकरतमन्यारीअहोद्खोगतिन्यारीठरि- यानिनिकोजाहहे । भक्तिछविभारततिनमितगारटोतदोतव्रा लखेजोईयातेजानिपाईहे ॥ ५ ॥ भक्तिपंचररपे ॥ सोभक्तिको स्वरूप क्रियात्मक सो क्रिया दते जानीनाई है ॥ भागवते ॥ देवानांगुणलिंगानामानुश्विककर्मणास ॥ सत््वएयेकमनसोव्निःस्वाभाविकीतुया ॥ १ ॥ अनिमित्ताभागवतीभक्तिः सिद्धेगेरीयसी ॥ जरयत्याशयाकोशं निगीर्णमनरोपथा ॥ २ ॥ जसे रसनमें इंद्री स्वाभाविकीही चलेहे ऐसेही समस्त टेद्रिय भक्तिम्‌ स्वाभावि की लगे या क्रियाते भक्ति. जानीजाइ है सो भक्ति पंचप्रकार की जेसे इपको रस खांढ बुर्रो मिश्री कंद ओरा स्वाद न्यारे न्यरि त्व एक ॥ ॥ ३ ॥ रांतसर ॥ दोहा ॥ यमकर मुहतरहठिपरयो, यह धारि हरि चितखा३्‌ ॥ विपयतृपा परिहर अजौ, नरहारके गुणगाई ॥ ४ ॥ दास्य रस ॥ दासनदास्‌ तिहारी कणी प्रक मोते नहीं कछवे बनिआई । तेदुख- ठावनि मोदवदावनिं मोहित भोगकी नींमदिवाई ॥ आपही मं विसस्यो तिनमें पगिताते तहां तुम्हरीको चलाई । पेआपअप्नो जानिगहो নানি जातिअहो तुम्हरी ये बढ़ाई ॥ ५ ॥ कवित्त ॥ गणनर्गहहों मन व्यारमें वेरा तेरी दीलनदहुहाँ पंचरंगको पतंगमें । जितहीकन्यावतदी वितदी में आवतहों देयेसुकरिधावतहां प्वनके संगमे ॥ गयोभारिवाय हरि उपर नरहबी आइ ताते थिनथांसर्थेग्यों थिरंकनिके रंगर्म । हर हर एंचिनाथ कीजियेज्ू अपनी घानातरु अनाथ जात अनंगकी तरंग ॥ ६ ॥ सख्य च




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