भाषा पिंग्दल [खण्ड १] | Bhasha Pingdal [Vol. 1]

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Bhasha Pingdal [Vol. 1] by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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| (१७) तज लोकलाज विधवा को भी परणावे । অহ मेघ-माल लख मनमयूर दरसावे ॥ २ ॥ पर विचार कौने-जो जन आयू सारी । को पापकप में नह्टू-दुए था भारों॥ जिन करी जन्म भर-हिंसा, चोरी, जारी । मरने पर मोच्छा किया पत्र ने भारी ॥ उस लीला से क्‍या बने / किया फल पावे । . यह मंघ-माल खख मनमयूर हरसावे || ३ ॥ गंगाजल आदि पवित्र विपल सुखदाई। प्र पुक्ति-पंथ तो ज्ञान सिवा नहिं भाई ॥ “ভি বাম पिनाशे पप्र सोचिये प्यारे । तब दुख. में क्यों फंसे रहे सुबन्धु हमारे ॥ कारण दुख. का है “पाप” निगम यह्‌ गावें | यह मेध-पाल लख मनमयूर हरसवे ॥ ४॥ ` यदि कहो “दुःख नहिं मि, गंग न्दते से| ` बस पाप मूल ही हटे, गंग नहाने से |! “प्र गंगासेवी कई बनाइस वाले । - सो सो वर नहा के है चित्त के काते क््योंकर बन्धन विन मन धोये कटजावे । यह मेघ-माल लख मनमयूर्‌ हरसे ॥ ९ ॥ .. भाया को पजा दश मान के करना ।? . . | अन्धकार का कारण ति ने वरना ॥, खो पुष्प गन्ध से भी ` सत्तम जगरा३ । उसको प्रतिमा बनि सके न कोटि उपाई || तानक, कबार, -हारदास यहा समभाव।




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