नवरस | Navras

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Navras by बाबू गुलाबराय - Babu Gulabray

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२ नवरस श्राचाय्यं विश्वनाथ का भी यही मत है । भोज, जयदेव, वाग्‌- भ्वादि ने रस को प्रधान माना है; किन्तु विश्वनाथ की भाँति रस को काव्य का एकमात्र लक्षण नहीं कहा है। उन्होंने सब मतो को मिलाना चाहा है | उदाहरणतः वाग्भट्रकृृत निम्नलिखित ज्छोक देखिये- साधुशब्दा्थ सन्दर्भ गुणालङ्कारभूषितम्‌ । स्फुटरीतिरसोपेतं का्यं कुर्बीत कीत्तये ॥ अ्रथोत्‌ शब्द ओर अथ की साधुता के सौन्द्य्य स भरा गुण ओर अल्लारो से विभूषित रीति तथा रस के सहित काव्य को यश के लिये लिखना चाहिये । इन सब बातो का लिखना वेसा ही है जैसे आफत का मारा मनुष्य सब देवताओ की पूजा करता है। महात्मा तुलसी- दास के शब्दों मे वह “बरी बरी में नोन” देता है। ऐसी परि- भाषा मे किसीकी प्रधानता नहीं रहती । 'एकहि साधे सब सघधे' की-सी व्यापकता नही है। ऐसी व्यापकता है किससे ? इसका निर्णय सब मतो की विवेचना करने के पश्चात्‌ अन्त में किया जायगा । यहाँ पर इतना बतला देना आवश्यक है कि रस क्‍या है ९ व्युत्पत्ति से रस का अथ इस प्रकार है--“रस्यते आस्वादते इति रसः अथौत्‌ जिसका आस्वादन किया जाय वह रस है । इस आस्वादन मे आनन्द लक्षित रहता है । यदो पर॒ रस के विषय मे इतना ही का जाता है । (२) अलङार-मत-अलङ्कार को प्रधानता देनेवाले यचार्य्यो मे उद्भट) दण्डी श्योर रुद्रट प्रधान है। उद्धरादि ने गुण और




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