जैन धर्म और तेरहपंथ | Jain Dharm Aur Terahapanth
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
190
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)सैरह पथ ‰साधुओं को देसऊर वह घोला--सह्ाराज़ ! उदास कैसे बेरे
हो, कया कारण है ?भीखन-भाई क्या बताए, शुरु मे हमें सम्प्रदाय से बाहर
कर दिया है । हम नया पथ बनाना चाहते दे, पर अभी तक
पथ का नामररण सस्कार नहीं कर सके हैं, बस इसी बात की
चिन्ता है ।मिरासी--ओह | नाम रसना क्या कठिन है, बताओ
फितने साधु हो १भीसन--हम तेरह साधु हैं, नाम अच्छा सा बताना |मिरासी-सुनिये --आप आपको गिल्ला करे, ते आपको मत ।
देखोरे शहर के लोगा, तेरा पथी त्तत ॥भीसन ने जब अपने पथ का नाम तेरा पथ सुना तो बडा हर्पित
हुआ । यत “तेरा! शब्द के टो अथे निऊलते हैँ. --एक तो
तेरा साधुओं का पथ, दूसरा --भगवान् | तेरा प्रथ। किन्तु
दूसरा अर्थ कल्पित है क्योंकि --बागड देश मे तेरा शब्द हने
में नहीं आता | वहा ता थारा? कह्दा जाता है । यदि द्वितीय
ऋथे को समक्त रखकर नामकरण किया जाता तो श्रवश्यमेव
भथा पथ नाम रसा जाता । वहा “तेरह साधुओ का निर्मित
पथः दी शथे र ऊर नाम कल्पित फिया गया है। भीसन को
नेता घना दिया गया । वे तेरह ही भेषधारी जदा पर खानक
बासी साधुओं का गसनागमन नहीं था, उसी तरफ चलं पडे ।
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