काव्य के रूप | Kaavy Ke Roop

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Kaavy Ke Roop  by गुलाबराय - Gulabray

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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काव्य के रूप १ साहितय का स्वरूप साहित्य का उदय इस संतार मे जन्म लेते ही शिशु रोने लगता हे | यह उसकी संसार के प्रति पहली प्रतिक्रिया हे | वह स्तन्यपान करता हे और धीरे-धीरे श्रपनी নালা को पहचानने लगता दे । उसकी गोद में उसे सुख संसार श्रौर हम मिलता दे । चारपाई पर लिया देने से वह रोने लगता है । रोना, हाथ-पेर फेकना या मुस्कराना उसके सुख-दुःख की अभिव्यक्तितयाँ हैं । संसार के प्रति हमारी कुछ-न-कुछ प्रतिक्रिया होती है | पदले हमको उसका ज्ञान होता है फर उसके प्रति हमारा आ्राकर्षण या विकर्षण होता है। हम विभिन्न वस्तुओं को प्राप्त करने का यत्न करते हैं | हम किसी सुरम्य उपवन में पहुँच जाते हैं । शुर दास्यमय्री सद्य विकसित कलिकाओं के सौरममय सौन्दय का नेत्र और नासिका द्वारा हमें ज्ञान होता है | उस ज्ञान के साथ ही हमारा मन आन्दोलित दोन लगता हे | इम कहने लगते हैं - নীলা सुरम्य दृश्य हे ! इच्छा होती है यहीं बेठे रहें ?/--और सामने पड़ी बेंच पर हम गुनगुनाने लगते हैं । उपयुक्त अनुभव में हमको तीन प्रकार की मनोवृत्तियों का परिचय मिलता हे | हमको शान मिलता है । ज्ञान के साथ हमारे भाव लगे होते हैं, जैसे--मित्र को देखकर प्रसन्‍न होना, शत्रु शा अत्याचारी को देखकर दुःखी होना या प्राधारभ्त किसी अद्भूत बात को देखकर आश्चयान्वित होना। इमारे मनोवत्तियां মান हमारे मस्तिष्क को चह्दारदिवारी में बन्द नहीं रहते हैं । हम भावों के अनुकूल क्रिया करने लग जाते हूँ । मित्र को देखकर उसके स्वागत को उठ खड़े होते हैँ । शत्रु को देखकर उससे दूर भागने श्रथवा उसे दूर भगाने की कोशिश करते हैं | इन मनोबृत्तियों को ज्ञान, भावना और संकल्प (जो क्रिया का मूल है) कहते हैं ।ये तीनों मनोइत्तियाँ कबूतरखाने को भोति श्रलग-श्रलग कीं में नहीं रहती हैं। जिसकी जिस समय प्रधानता होती हे उसी के श्रनुकूल उसका




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