व्यंग्य परिप्रेक्ष्य हरिशंकर परसाई साहित्य का मूल्यांकन | Vyagbidha Ke Pripechya Me Harishankar Parsai Sahitya Ka Mulyankan

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Vyagbidha Ke Pripechya Me Harishankar Parsai Sahitya Ka Mulyankan  by अजय कुमार पांडेय - Ajay Kumar Pandey

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हुए कहते है-- विनोद कालिन्दी की आनन्द लहर है और व्यग्य बरसाती गगा की उफनती धारा का कालग्रासी भंवर। विनोद साहित्य का कान्ता सम्मित रस है ओर व्यग्य गुलाब के नीचे का काँटा।' डॉ शेर जग गर्ग ने उदेश्य की कसौटी पर कसते हुए हास्य एव व्यग्य का अन्तर इस प्रकार बताया है - “हास्य निष्प्रयोजन होता है ओर यदि उसका कोई प्रयोजन होता है तो यह निश्चय नही होता।ः हास्य ओर व्यग्य के सम्बन्धो জী ভাঁ बलेन्दु शेखर तिवरी ने इस प्रकार से व्यक्त किया ই “हास्य सुन्दर की कामना करता है ओर व्यग्य लक्षय की पुकार करता है, स्पष्ट ही हास्य की अपेक्षा व्यग्य मे तेजी और गर्मी होती है।”* हास्य और व्यग्य को प्रयोजन के आधार प्र ही अलग किया जा सकता है। हरिशकर परसाई ने इसे इस प्रकार व्यक्त किया है “आदमी कुत्ते की बोली बोले यह एक विसगति है। वन महोत्सव का आयोजन करने के लिए पेड काटकर साफ किये जोय जहो मन्त्री महोदय गुलाब के वृक्ष की कलम रोपे, यह भी एक विसगति है। दोनो मे भेद है, दोनो मे हँसी आती है। दाँत निकाल देना उतना महत्त्वपूर्ण नही है।' हास्य और व्यग्य मे मुख्य अन्तर लक्ष्य और दृष्टि के कारण है। एक मे विसगति का लक्ष्य हास्योद्रेक होता है तो दूसरे मे विसगति चित्रण द्वारा विकृत स्थिति, विकृत मनोवृत्त, विकृत स्वीकृत पर प्रहार है। एक में विनोदी स्वभाव वश विकृति का चित्रण है तो दूसरे में गहरी सूझ्- बूझ के परिणाम स्वरूप विकृति का प्रदर्शन है। हास्य स्वभाव की विनोदप्रियता के कारण हो सकता है परन्तु व्यग्य परिवर्तनकामी चेतना तथा गहरी सामाजिक दृष्टि को साथ लेकर चलता है। हास्य केवल मनोरजन के कारण होता १ साप्ताहिक हिन्दुस्तान - २४ मार्च १९६८, पृष्ठ ८ २ डॉ शेर जग गर्ग - स्वातन्त्रयोत्तर हिन्दी कविता में व्यग्य, पृष्ठ २९ ३ डं बालेन्दु शेखर तिवारी ~ हिन्दी का स्वातन्त्रयोत्तर हास्य एब व्यग्य, पृष्ठ-५९ ४ हरिशकर परसाई - सदाचार का ताबीज, कैफियत




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