दिवाकर रश्मियाँ | Diwakar Rashmiyan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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_ ] 1 १६ |से महापुरुष का जन्म होता है | तप के प्रताप से ही वह अलौ- किक क्रत्य करके दिखलाते हैं ।८२२)प्राचीन उदाहरण सेकडो की दही नही, सहस्रौ को संख्या में मौजूद है । पर तपस्या के प्रभाव को आज भी प्रत्यक्ष देखा जा सकता ह । कलकत्ता ओर खरे स्थानोमे गानीजी ने अपने जीवन में कई बार उपवास किये । उन्होने भोजन त्याग दिया । उसके प्रभाव से कठोर से कठोर और पापी से पायी मनुप्यो के हृदय भी बदल गये! उन्हे भी तपस्या के सामने झुकना पडा ।( १३ )स्वेच्छापूर्वेक, पारमा्थिक दृष्टि से कष्टो को सहन कर लेना तप है । तप का बहिष्कार करने का मतलब यह होगा कि जब कोई कष्ट आये तो उसे स्वेच्छा पूर्वक सहन न किया जाय 1 सहन न करने मात्र से कष्टो का आना तो रुक नही जायगा, तप को त्याग देने से सहन करने की शक्ति अवश्य नष्ट ही जायगी । एेसी स्थिति में जीवन कितना क्लेशमय आर दीनता- मय ही जायगा, यह्‌ कल्पना ही वद्य भयावह है 1( १९४ )भगवान्‌ ने उपवास की तपस्या को महत्त्व देने के लिए बाह्य तपो में अनशन तप को सब से पहले गिना है । गहस्थो




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