अंतराष्ट्रीय कानून | Antrarastriye Kanun

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Antrarastriye Kanun by हरिदत्त वेदालंकार - Haridatt Vedalankar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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८५9 घोत्रहवौ ˆ श्रघ्याय--राजतयिक परतिनिधि-- राजदूत शरोर वाणिज्यदुत्त % (71272102523120 22515 29 0925825) ३३८-३६४५ प्राथोच एव मध्यकाल मे दूत प्रथा, पु० ३३८, राजनसिक मसम्बन्धो का নিলা भ्रभिसमय, पृ० ३३६, दूनो की श्रेणियाँ और प्रकार, पृ० ३३६, (क) राजदून, ° ३४०, (ख) पूर्णाविकार मन्त्री तया अ्रमाधारणा दूत, ঘৃ ২৫০, {म} निवासी मन्त्री, परऽ ३४१, (च) कार्येटूल, प° ३४१, दूती की नियुक्ति, पू० रदीङरणीय व्यक्ति, एृ० ३४४ दूतो के कायु, पृ०३४५०/दती के विरोषाधिकारश्रर उन्मुक्तियां, प° >४९ , वैयक्तिक सुरक्षा तेया अवघ्यता, प्रु० ३४६, राज्यतितक्रह्णता, प° ३५१. फौजदारी स्परयालयों के क्षेत्राघिकार से सुक्ति, पृ० ३४०, दीवानी व्यरयालयों के क्षेव्राधिकार से मुक्ति, पृ० ३५३, यजाही देने के कायं से मूक, पृ० ३५५, करो से मुदि प ३५५, उपासया वा अधिकार, पूण ३५६, पत्र-व्यवद्धार की स्वतन्त्रता, पृ० ३५६, सीमि क्षो नाधिक्रार, यू० ३५६ , दूत के झनुयायी वर्ग के विदोधाधिकार पृ० ३५६, उन्मुक्तियों का झारम्भ और समाप्ति, पृू० ३५७, दौत्यकार्य की समाप्ति के कारण, प्र० ३४८, वाशिज्यदूत, पृ० ६३६२, वाणिज्य विषयक राम्बन्धो का १६६३ का वियना झ्भिसमय, पृ० ३६४। कण @ 1৭ নে 7 एवां -्रष्यष्य-- सम्वियां (१९००५) ३६६ संन्धियो का स्वरूप, पृ० ३६६, सन्धि और सब्रिदा पृ० ३६६, सन्मिवाची कुछ शब्द, पू० १६७, (१) अभिसमय, पृ० २६७, (२) प्रोतोकोल, पृ० ३६७, (२) समझौता, पृ० ३६७, (४) व्यवस्था पृ० ३६८५ (५) ४ प्रामाणिक विवरणा, पृ० ३६८, (६) परिनियम पृ० ३६८ (७) घोपगणा, पृ० ३६८, (८) अस्यायी प्रणाली, प्रृ० इष्ट (&) सपत्रो का विनिमय, पृ० ३६०, (१०) चरग कानून, पृ० ३६८ (११) सामान्‍य कानून, पएृ० ३६८, सन्ध्रि सम्पादन के आठ झावब्यक स्‍झग प्रू० ३६६, राह- मिलन और अभिलरयता, प्रू०. ३७० सन्वि का साय होगे, ऐ० ३७०, परजीररण झौर प्रकाशन, पु० ३७० सनत्यिया का तियान्वय धू० २७१, सन्धि की बनावट, यू० ३७१ सन्धिया का वर्गीकरण बू० ३७१, (क) राज नीतिक सन्धियाँ, यू० ३छ२, (ख) व्यापारिक सब्बियाँ, प्र 5७२ (ग) सामाशिक सत्वियाँ, पू० ३७२, {च} दीवानी न्यायसम्वन्धी सन्पधियाँ, ও হুড, (ड) फौजदारी न्यायविपयक्त सन्धिया प्र*३७३ अवैध सन्धिया, पृ० ३७३, रान्धिपालन का उपाय घृ० ३७८, सन्धिविषयक दो सिद्धान्त * (क) सन्धियों की पंविनता, पृ० ३७५, (ख) रिथति नी अपरि- बर्तनशीलता, पृ० ३७५, सन्धिया की समाप्ति, पृ० ३७९६, सन्पियों पर युद्ध छिडने का ब्रभाय, पृ० ३८०, सन्वियो फी व्यास्या के सामा“य सिद्धारत फी व्यारया के सामान्‍य सिद्धास्त,




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