गीतामृत | Gitamrit

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Book Image : गीतामृत  - Gitamrit
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नभ्न निषेदणललाट परं सिन्दर॒ की बिन्दी का अर्थ लगाया गया कि बेचारी को - उसके पति ने मारा है, जिससे ललाट से खून निकल रहा है। कालेज मे पदी हुई इतिहास की पुस्तकों की याद आई | उनमें बी० ए० में पढ़ाये जाने वलि इतिहास ग्रंथों में हम पढ़ते थे, ''शिवाजी पहाड़ी चूहा है ! तिलक चित्यावन ब्राह्मण हैं !! हिन्दुस्तानी गुच्ामी के आदी हैं !!!” स्टेनलो लेन- पूल की 'मध्य युगीन मारत” नाम को इतिहास-पुस्तक ण्दि मेरी स्मृति मुझे धोखा नही देती, तो बीस तीस सोलह पेजी आकार से बड़े आकार की आठ सौ पृष्ठ की पुस्तक थी, परन्तु -मध्यकालीन भारत के इतिहास की इस पुस्तक में महाराणा प्रताप के विषय में आठ प॑क्तिया भी नहीं थीं | दा, इस बान का पिशद वर्णन था कि मुसलमान हिन्दुओ पर केसे-केसे जुल्म करते थे ? उनके मुह में थूकते थे, इत्यादि | सरजान स्ट्रेची के ब्रिटिश भारत! में माम्राज्यवाद का नंगा प्रचार था। जोधपुर के किसी महा- राज के मुह से कहाया गया था कि हम बंगालियों के राज्य में रहने को कदापि तैयार नहीं हैं| किसी और से कहलवाया गया कि अगर अग्रेज हिन्दुस्तान से चले गये तो कंचनचज्ञा से लेकर कन्याक्रुपारी तक एक भी हिन्दू स्त्री का सत्तील भ्रष्ट हुए. ब्रिना न रहेगा | इस इतिहास-प्र॑य मे यह भी लिखा था कि कोई तिवाना हिन्दुस्तान के आदर्श पुरुष हैं | सब हिन्दुस्‍्तानियों को उन्हीं के पद-चिह्नों पर चलना चाहिए. | इसके अतिरिक्त पाश्चात्यों की सम्पत्ति, समृद्धि और सहलश: नए-नए शस्त्रास्त्रों म सुसज्जित उनकी सनिक शक्ति देखकर भी स्व्रभावत1 लोग चौधिया गए हैं । ऐसी दशा में यदि इस पराधीनता-पूतना के इस विषमय पय को पान करते हुए भारत की स्वदेशी संस्कृति और सम्पता को अन्तरात्मा मतप्रायहो चुकी हो और भारतो शिक्षितों की -ह मानसिक दासता, इद्धलैंड नहीं तो किसी «दूसरे देश की अन्धानुयायिनी हो गई हो, तो इसमें आश्चय॑ ही क्या ९अन्तरात्मा पुकार उठी -क्या ज्ञान-गगा के इस उलट प्रवाह को रोका नहीं जा सकता ? स्रा उदे पुनः स्ञे-सीये खन्मार्गं पर नहीं प्रवाहित




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