मानसरोवर भाग - 5 | Manasarovar Bhag - 5

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Manasarovar Bhag - 5 by श्री प्रेमचन्द जी - Shri Premchand Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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निमन्त्रण পাশপাশি হাল शाची, লীহান হাজী, উহীহাল হাজী, অনানীযান হাজী দুলাল হী, मोटेराम शाल्री आदि जब इतने आदमी अपने घर ही में हैं, तब बाहर कौन आह्मणों को खोजने जाय । सोना--और सातवाँ कौन है ? मोटे०--बुद्धि को दौड़ाओ । सोना--एक पत्तर धर ठेते आना । मोटे०--फिर वही बात कही जिसमें बदनामी हो। छि-छि, पत्तल धर लाऊँ । उस पत्तल में वह स्वाद कहाँ, जो यजमान के घर बेठकर भोजन करने मे है । सुनो, सतव महाशय दँ - पण्डित सोनाराम शाली । सोना--चलो, द्ल्लगी करते हो । भला, मँ केसे जमी मोटे ०--ऐसे ही कठिन अवसरो पर तो विद्या की आवश्यकता पढ़ती है । विद्वान्‌ आदमी अवमर को अपना सेवक बना लेता है, मूर्ख अपने भाग्य को रोता है । सोना देवी और सोनाराम शास्त्री में क्या अन्तर है, जानती हो» केवल परिधान का । परिधान का अथ समम्ती हो ? परिधान 'पहनाव' को कहते हैं । इसी জাতী को मेरी तरह बाँध लो, मेरी मिरज़ई पहन छो, ऊपर से चादर ओढ लो। पगणडढ़ी में, वाँव दूँगा। फिर कौन पहचान सकता है ? सोना ने हँसकर कहा--मुझे तो लाज लगेगी । मोटे०--तुम्हें करना ही क्या है ? बातें तो हम करेंगे । सोना ने सन-ही-मन आनेवाले पदार्थों का आनन्द्‌ लेकर कहा--बढ़ा: मज़ा होगा | मोटे०--बस, अब विलम्ब न करो। तेयारी करो, चलो । सोना - कितनी फकी बना छे ? गट ०--यह में नहीं जानता । बस, यही आदश सामने रखो कि अधिक-से- अधिक लाभ हो । सदसा सोना देवी को एक बात याद्‌ आ गड । बोली--अच्छा, इन बिछुओं फो क्या कष्टंमी ए मोटेराम ने योरी चढाकर कडा ~ इन्हें उठाकर रख देना, और क्या करोगो १ सोना--दां जी, कयो नदीं ! उतारकर रख क्‍यों न दँगी।




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