गुप्त जी के काव्य की कारुण्यधारा | Gupt Ji Ke Kavya Ki Karunyadhara
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
9 MB
कुल पष्ठ :
404
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)জীछुमारो प्राचीन परम्परा के अनुसार 'कारुण्य' काव्य का मूल है,
जब वाल्मीकि ने क्रौञ्च-युगरू मे से एक को व्याध हारा मारे जाते हुए
देखा, ओर उनका हृद्य करुणा-रसं से आष्लाचित हभ, उसी क्षण उनके
हृदय मे काव्य-धारा फूट पडी और इस प्रकार आदि-काव्य का प्रारम्भ
हुआ । इसलिये गुप्तजी के काव्यों में कारुण्य-धारा की खोज काव्य की
सर्वोत्कृट कसौटी की खोज है। अत्तः एतद्धिपयक प्रस्तुत मननात्मक
रचना---अर्थात् “शुघ्तजी के काव्य की कारुण्यधारा” के लिये हिन्दी
साहित्य के प्रेमियों और अध्येताओ को श्री प्रोफेसर धर्मेन्द्र चर्मचारी,
एम. ए. का अनुगृहीत होना चाहिये |
सुद्धे अपने बाल्य-कारु सँ गुक्षजी ङी रचनाभो को पठने का सौभाग्य
प्राप्त हुआ था, ओर उनके द्वारा जीवन-स्फूर्ति सिली थो । गुप्तजी हमारेष्य
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