महाराजा सूरजमल और उनका युग | Maharaja Surajmal Aur Unka Yug

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
शेयर जरूर करें
Maharaja Surajmal Aur Unka Yug by प्रकाश चन्द्र चांदावत - Prakash Chandra Chandavat

एक विचार :

एक विचार :

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

प्रकाश चन्द्र चांदावत - Prakash Chandra Chandavat के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
[ १५ |जाटों के सम्पर्क में आते के वाद उतके बारे में उन्होने जो कुछ लिखा, वह्‌ सवे विभिन्न प्रकार के संकलनों द्वारा ठोस ऐतिहासिक सामग्री का निर्माण करता है । बगरू के युद्ध (१७४८ ई०) से लेकर सूरजमल की मृत्यु तक जाट-मराठा सम्बन्धों, सूरजमल के विभिन्न युद्धों और राजनैतिक गतिविधियों पर ये मराठा पत्र विस्तृत एवं, उपयोगी जानकारी प्रदान करते हैं । प्रस्तुत ग्रन्थ में 'पेशवा दफ्तर', 'हिंगणे दफ्तर' और ह वखर' से प्राप्त मल्यवान्‌ सामयिक सामग्री का व्यापक उपयोग किया गया है।पेशवा दपतर की ४५ जित्दों मेँ प्रमुख रूप से জিত संख्या ।, उ वे अभ। से जाट विषयक बिपुल सामग्री मिलती है और जिल्द संख्या हए व 751$ के कुछेक पत्र ही उपयोगी सिद्ध हुए हैं । जुलाई १७५० ई० में सूरजमल और वज़ीर सफ़दरजंग के बीच विधिवत्‌ मंत्री समझौते की एकमान्न प्रामाणिकसूचना हमें पेशवा दफ्तर ॥ के पत्र संख्या १४ द्वारा प्राप्त होती है । यद्यपि ये पत्र अधिकांशतः: मराठा दृष्टिकोण को प्रतिबिम्बित करते हैं, किन्तु समकालीन फ़ारसी खोतों से तुलनात्मक आधार प्र उनमें उल्लिखित तथ्यों की पुष्ठि की जा सकती है। दिल्‍ली स्थित मराठा राजदूत हिगणे वन्धु (बाप पूरपोत्तम महादेव भौर दामोदर महादेव) ओौर पेशवा के नीच का पत्र-व्यवहार 'हिंगणे दफ्तर' की दो जिल्दों में संकलित है। राजधानी से लिखे जाने . के कोरण हिंगणे के पन्नों से समकालीन घटनाओं के विषय पर अत्यधिक महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। यद्यपि अधिकांश मराठी बखर ऐतिहासिक तथ्यों से दूर हैं, किन्तु भाऊ बखर' इसका अपवाद है, जो प्रस्तुत विषय कै लिए वहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। इसका लेखक कृष्णाजी शामराव दिल्‍ली के निकट रहता था और अधिकांश घटताओं से भलीभाति परिचित था। कुम्हेर पर मराठा आक्रमण भौर पानीपत के युद्ध के पूर्व सूरजमल और भाऊ के मतभेदों पर भाऊ बखर शब्दशः प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करता है, जो सर्वाधिक महत्व का है। यह सम्भव है कि लेखक अपनी शैली के आवरण में भाऊ के प्रति द्वंघ एवं शिन्दे के गौरव को छिपाने का प्रयास करता है, किन्तु इससे उसके द्वारा प्रस्तुत तथ्यों की विश्वसनीयता में कोई कमी नहीं आती है। उसके द्वारा प्रस्तुत अधिकांश तथ्यों की पुष्टि सामयिकं फारसी स्रोतो जसे काशीराज, मीरात-ए-अहमदी, इमाद उस सादात मादिके द्वारा होती है ।१६०४ ई० में वि० एठले को भाऊ बखर के नाम से एक अन्य बखर का पता चला । परल्तु इसकी प्रामाणिकता सन्देहजनक प्रतीत होती है । र्य के लेखक के अनुसार यह भाऊ के गुप्त पलायन कै दिन (पौष शुक्‍त्रा ८ शक संवत्‌ १६८ २) ही मु० शेवढ़े (बुन्देलखण्ड) में लिख दी गई थी। इसमें सूरजमल के प्रति भाऊ केव्यवहार को उचित ठहराने के लिए सूरजमल ओर मल्हार राव होल्कर की (संदेह जनक) घनिष्ठता को आधार बनाया गया है । ३ 2২अप्रकाशित “एठले दफ्तर” प्रस्तुत विषय के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुमाहै । इसमें १७४४ ई० से १८१६ ई० के बीच के महत्वपूर्ण पन्नों का संकलन है।इसमें अन्ताजी माणकेश्वर द्वारा लिखा गया एक महत्वपूर्ण पत्र है (पत्र संख्या ३०,२१ जनवरी १७५७ ६०), जो अब्दाली से अन्ताजी की प्रथम मुठभेड़ के दित कीददशा परर प्रकाश ढालता है ओर भावी नीति तथा सूरजमल के प्रति मराठा




User Reviews

अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :