कूटकाव्य एक अध्ययन | Kutakavya Ek Adhyayan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प का महत्त्व भ्रशकारों का प्रमोस सौरदर्यानुभूति की बृद्धि एवं पूटत्व क्॒ प्रयोग के लिए । सूर के शुटपर्दों के तीन प्रयोगव--बमत्कारिता रहस्पास्मक कप से धौन्दर्यबर्णम प्रौर रठि तथा बिमोग की ध्यचापूर्स ददर्प्ोष्ी तीदवा का पनुमष यमक पलप रूपुकातिध्योत्ति, भिरोषामास भाभ्विमानू प्रादि प्रलकारो पर पाभ्मित दर्टोकफेगरष सदाहरण । झम्प इबाइन--अ्षम्दमाप्ता स्म्दसाम्प से भ्रबंबोभ झड़ार्थ हारा प्रबंधोग गरप्योम से अ्रम्दभोष भ्रौर प्रहेशिका पर प्राभित कूटो के कूछ उदा इरण। पाया शबा प्षेश्ी--वूट्त्व के लिए सम्द प्रमोग । खूर के कहों को दिप्ेफ्ता ১১ परिक्षिपणण फ--सूर के कूटपदो के सप्र प्व २१७--२४२ ज--(१)--पम्रृस्पापर के फूटपद २४३--२११ (२)- ध्रूरघारगशी के पूटपद २१४--२१६ (१)--शाहित्यघहरी के शुटपद २१४--१ २८ स्र-पदो की प्रकारादि एम से प्रभुक्तमरिषका (१)- प्ृरसायर के पद्दो कौ प्रमुकृम रि[का ७ ३२९--११८ (२)--शाहित्मशहरी के पद्दो कौ प्रशृ्मरिका. १३१---३४२




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