नागयज्ञ | Nagayagya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१४ 'एक है। इसलिये अरबी या हिन्दुस्थानी होनेसे हिन्दू-मुसलिम मेरूको अस्वाभाविक बतलाना ठीक नहीं । १० लिपिभेद कटा जाता है कि हिन्दुओंकी लिपि देवनागरी है और मुसलमानोंकी 'फारसी, अब दोनोंमें मेल केसे हो ! यह एक नकली झगड़ा है । इस्लामका मूल अगर अरबमें माना जाय तो अरबीको महत्ता मिलना चाहिये। फारस तो इसलामके लिये ऐसा ही है जैसा कि हिन्दुस्थान । फारसमं हिन्दुस्थानकी या हिदुस्थानमें फारसकी लिपिको इतनी महत्ता क्‍यों मिलना चाहिये । खैर, मिलने भी दो, पर न तो नागरी हिन्दुओंकी लिपि है न फारसी 'मुसलमानोंकी । बंगालके हिन्दू नागरी पसन्द नहीं करते, मद्रास तरफ भी हिन्दू नागरी नहीं समझते; खास तौरसे जिनने सीखी है उनकी बात दूसरी है । उधर पंजाब तरफके हिन्दू नागरीकी अपेक्षा फारसीका उपयोग ही अच्छी तरह करते हैं ओर मध्यप्रान्तके मुसछमान फारसी लिपि नहीं समझते । इस प्रकार भारतमें अगर फारसी लिपिको स्थान मिला है तो वह प्रान्तके अनुसार मिला है न कि जातिके अनुसार | इसलिये इन्हें हिन्दू मुसलमानोंके मेदका कारण बनाना मूक है । अच्छी बाततो यह दै कि सर्वगुणसम्पन्न कोद एेसी लिपि हो जिसमें लिखने और पढ़नेमें गड़बड़ी न हो। छपाईका सुमीता हो, सरल भी हो। देवनागरीमें भी इस दष्टिसे बहुत-सी कमी है, वह दूर करके या और किसी अच्छी लिपिका निर्मोण करके उसे राष्ट्रलिपि मान लेना चाहिये । पर जब तक लोगोंके दिल अविश्वाससे भरे हैं तब तकके लिये यह उचित है कि नागरी ओर फारसी दोनों ही राष्ट्रलिपियां मानली जॉय। हरएक शिक्षितको इन दोनों लिऐयोंके पढ़नेका अभ्यास होना चाहिये और लिखना वही चाहिये जिसका पूरा अभ्यास हो। कुछ दिनों बाद जब जातिका घमंड न रह जायगा, तब जिसमें सुभीता होगा उसीको हिन्दू और मुसलमान दोनों अपना लेंगे। ११ भाषाभेद्‌ लिपिकी যা भाषाका सवाल और भी सरल है । जबरदस्ती उसे जटिक बनाया जाता है। लिपि तो देखनेमें जरा अलग मादूम होती है और उसमें




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