गंगा भरए | Ganga Bharan

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Ganga Bharan by नंदकिशोर मिश्र - Nandkishor Mishr

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ५ ) सब काम में करत गंगा मगा जिय जानि हित दान करों गग! को | झान करौ जगा जत कान फते मगा उर ध्मान धरो गंगा गुनगान करों गंगा को। १॥ निदान साधारण कूपोदक का त्याग करके फिर अवशिष्ट जीवन में गंगानल परही निर्भर रहें । घर से गंगाजी के दर होने के कारण सदा पात्रों में जल बतेमान रहता था और इसी से ठपा निवारण की जाती थी। एकबार भर्यकर ग्रीष्म क्रतु के समय एक आकस्मिक पटना वश पात्रा ऋ गमा जल नष्ट होगया जब यह बात बिदित हुई तो तुरंत ही कड्ार गंगाजल लाने भेमे गये परन्तु उनके आने में कमसे कम ७ दिवस की आवश्यकता थी | ऐसी दशा 4 स्थानीय ब्राह्यणो फी फॉविरो से तिशुने चोंग्रुने मूल्य पर गंगाजल एकत्रित किया गया, परन्तु कोई सन्तोप प्रद फल न निकला कारण एकल्लोट भरसे अधिक जल प्राप्त न होसका इस लोटे भर অন্ত पर ग्रीप्प ऋतु के ४७ दिन काटने थे बस आप सब उस भर्यक्रर्‌ कृष्ठ का इसी से अनुमान कर सक्ते हैं, परन्तु आप विचलित नहीं हुये ओर इतने जल पर निभैर रहने का दृढ़ निश्चय कर छिया। तीन दिन तो बड़े दुःख से व्यतीत हुये परन्तु चोथे दिन असहाय कष्ठ था उसी समय में कहारों न जल उपस्थित किया इसी घटना का अवलम्बन लेकर आपने निम्नलिखित छन्द बनाया; गंग के नीर को नेम लियो बस जीविका के भयो बास परे हैं। केयो दिना सुत्रिना जलन के गये पे पनते नहीं नेक थरे हैं॥ हेरत राह कछखों छेखरान सुलाखन ही आअभिराप करे हैं। तो लगि घीमर भार भरे जल गेग को पायक लाय परे हैं |




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