श्री भगवत दर्शन [खंड - 52] | Shri Bhagwat Darshan [ Khand - 52 ]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१२ भागवती कथा, खणड ५२पूछने में सकुचाती हू, दमारे दी द्वारा प्रश्न पुछनाती ই 19 डुबौसा मुनि बोले--/अच्छा, तुम ही पूछो। क्‍या इसका গহন হু?” ১ ক यद्‌ सुनकर वही कुमार बोला -“महाराज ! यह गर्भवती ইঃ अभी शीघ्र ही १० । ६ दिन में इसका प्रसव दोने वाला दे, चद्‌ चाहती हू मेर पुत्र हो । आप लोग तो निरालब्न दें ओर अमोघ-- दर्शन हैं । यह” बतावे कि इसके पुत्र होगा या पुत्री ” कथ प्रसब होगा 7? हि ^ पक यह सुनकर जितने कुमार थे, सभी को हसी आ गयी, बे मुँह परकर हँसने लगे । चनायटी बात को तो कोई व्यवहार पढ़ पुरुष भी समभ सकता हे, सो वे सर्वज्ञ मुनि थे। कुमारा की धृत्तता- को वे समभ गये, उन्हें उनकी इस बृष्दता पर नोध आ गया। अवितव्यता ऊी प्रेरणा थी, भगवान्‌ की इच्छा थी, विधि का ऐसा ही विधान था। जितेन्द्रिय और मतपरायण मुनियो को भी क्षोभ हुआ ने सोचन लगे--“भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र पीज होकर भी ये इतने धृष्ट ओर अबिनीत हैं, इन्हें इनकी अविनय का फ्ल चखाना चाहिए। भावीवश सभी ऋषियों के मन्त से यही बात बेठ गयी । डुबोसा मुनि तो ध की मूरति ही ये । वे सूखी हँसी हँसते हुए कहने लगे--“वेटाओ | यह घूँघट बाली बहू न ইভা जनेगी ने बेदा 1 ऐसी वस्तु जनेगी, जिससे तुम्हारे सम्पूर्ण कुल का नाश होगा। अर, धर्तों ! जिस छोकरे को तुमने छोकरी वना रस्या है, उसी के पेट से ऐसा मूसल निकलेगा कि उसी से तुम सयके सन इस लोक की लीला समाप्त कर जाओगे [7 महांमुनि दुर्बासा के शाप का सभी न॑ साधु-साधु कदकर अलु- मोदन सिया । यटुङ्कुमार सी उिनोद सब भूल गये। उनके मुख फफ पड गय | ये सयके सब मारे डरके थर-बर कॉपने लगे। किसी का भी साहस न हुआ कि मुनिग्रो से कुय कद्द सरके त्रे तुरत




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