अंधा संगीतज्ञ | Andha Sangitagh

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Andha Sangitagh by ब्लादीमिर कोरोलेंको - Bladimir Korolenko

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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से लटकतौ हुईं बफ़े की क़लमों से, जो पूप पाकर इस অনয বিল खो थौ, तेज़ी से झरतो हुई श्रसंख्य बूंदों की पटर-पढर सुनता। ये सारी ध्ववियं एक ककार कौ द्रत तरंगो में वंधी कमरे में प्रवेश करतों॥ कभो-रभी इ1 झंकारों और श्ोर-पुल के बीच उसे श्रासमान में उड़ते हुए सारक्षों का चहचहाना भी सुनाई देता, जो फिर धोरे-धोरे हवा में विलीव हो जाता। प्रकृति की इस वसन्‍्तकालीन सजीवता ने बच्चे के चेहरे पर व्याकुलता एवं परेशानों को मुद्राएं भ्रंकित कर दी খাঁ। बहु बड़े प्रयत से मौह सिकोड़ता , गर्दन सोचता, प्रकृति फ्री ध्वनियों फो ध्यान से सुनता भोर फिर अनेक प्रकार की ध्वनियों के परल्पर मिल जाते के कारण ভন श्रव्यवस्यित ध्वनिसमूह्‌ से भयभोत होकर सहसा श्रपने हाथ बढ़ाकर মা को दूँढ़ता, उसकी श्रोर झपटता और उसकी छाती से चिपट जाता। भव्या होता है इसे?” मां श्रषने श्राप से रौर इसरों से शती) দাদা সবি देर तक श्रौर बड़ी गम्भीरता से बच्चे ক ইং देखकर उस विचित्र भय फा कारण मालूम करने कौ फोर करते, पनु उन्हे कोई सफलता नम লিললী। न “बह ... वह समझ नहीं पा रहा है।” बच्चे के चेहरे पर दर्दनाक उलक्षन झौर प्रश्न का भाव देखकर मां प्रनुमान लगाती। सचमुच बच्चा बेचेन था शोर भयभीत भी। बह नयी-नयौ सुनता। उसे झाइचर्य होता कि जिन पुरानी ध्वनियों को सुनने भा बह इतना श्रम्यस्त हो चुका या, वे श्रव बां नहीं सुनाई पढ़ती! आफिर वै चली कहां गयो ह! ७3 वसन्त के प्रारम्भ की श्रव्यवस्या दान्त हो चकौ चौ ॥ दिन বারন ক साथ ही साथ धूप तेच् हुई और चारों शोर प्रकृति में भ्रधिकाधिक निखार श्राया । जोयन में मानो एक नयो उमंग भर श्रायो थो श्रौर उसकी गति सीव शौर तीग्रतर होती जा रदौ यी । चरगाह मे हरीतिमा सुस्करा उठी और भोज की कलियों फो सुग्ंधि ने सारे वातावरण को सुरभित कर दिवा। बच्चे को पास हो बहती एुक सरिता के तट पर ले जाने का निर्वप किया गया। १६




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