सारसमुच्चय टीका | Sarasamucchay Teeka

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Sarasamucchay Teeka by ब्रह्मचारी सीतल प्रसाद - Brahmachari Sital Prasad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आलहितकी आविह्यक्ता 1 [ ५ (परत्र च इह ) परलोके तथा इस रोक ( सुमत्‌ छदौ ) बहुत मारी दुःखको ( गच्छति ) प्राप करता ३ । भावार्थ-जिसको अपने आत्मके स्वरूपका विश्वास नहीं दै, जो केवर इन्द्रिय सुखकषो दी यख जानता है बह रातद्विन विषय- भोगोंके पीछे वावछा रहता है, इसीसे चार प्रकार आत्तिध्यानोंसें फंसा रहता है, इच्छानुकूछ इष्ट पदाथौके संयोग न द्ोनेपर किन्तु अनिष्ठ पदा्थौके संयोग हो जानेपर चिन्ता करता दै, यह अनिष्ट संयोगज आततेध्यान है । इष्ट पदाथौके वियोग होनेषर चिन्ता करता है यह इष्ट वियोगज आेध्यान है। शरीरे रोगादि होनेपर चिन्ता करता है यह पीड़ा चिन्तवन आरसैध्यान है । आगामी भोगसामप्री লিক হী चिन्ता करता है यह निदान आर्तेध्यान है। इन छलेशकारी भावोंसे इस लोकमें भी दुःखमई जीवन विताता है तथा संक्केश परिणामोंसे पापकम बांघकर दुर्गति्में जाकर तीम दुःख पाता है तथा आत्माक़ा 'कुछ भी हित नहीं कर पाता-मानव जन्मको वृथा खोकर एक अपूर्वे आत्मोत्रतिके साधनसे चूक जाता है | | ज्ञानभावनया जीवो छमते हितमात्मन/॥ . विनयाचारसम्पन्नो विषयेषठु पराइ्सुख! ॥ ४ ॥ . अन्वयाथ-( विनयाचारसम्पत्नो ) धर्म विदय व धमके आच- रणमें लगा हुआ तथा ( विषयेषु पराड्मुखः ) पांच इन्द्रियोकि विषयेति उदासीन ( जीवः ) जीव ८ ज्ञानभावनया ) सम्यम्ानकी भावना करनेसे (आतमनः हितं) सासाका हित (रमते) कर सक्ता है । 'मावार्थ-आत्माका हित सुख शांतिकों काम व कमे मलका




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