समकित-सार | Samkit Saar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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समकित सार 1 ( १३ ) भाई, समकित शल्पोड्डार के रचयिता जी । आपकी रचित पुस्तक को लिर से पैर तक पढ़ अनि पर भी, यद उसके द्वारा कद्दी जान दी नहीं पड़ता, क्रि 'समकित' क्‍या घस्तु है । क्या, आप के विचारानु सार, चह कोई गन्दी चीज है, या कोई चाट का बटोही है ? फिर, समकितवान्‌, पुरुष को तो, अक्षमा, अशान्ति, कठु, भाषण, *<प', वाच्य अनर्गल आलाप प्रलाप, और इन्हीं की जाति के अनेको अन्य अवगुणो से, निरन्तर पराइमुख रहना चाहिये। परन्तु इस पुस्तक के पक रचयिता के नात, आपने तो, यत्र, तत्र इसमें, ऐसे कुत्सित श्नौर गन्दे शब्दौ का खुल वाजार व्यवहार किया है, कि जिससे इस पुस्तक ही का नाम और कलेवर कलेाकित नहीं हुआ, चरन्‌, इस प्रकार के गनन्‍्दे व्यवहार से आपने अपनी मद्दीयसी वुद्धि की मद्दानता (? ) भी जैन-समुदाय पर प्रकट कर दी है । भाई ! ऐसा सवड्भर भूत आपके अन्दर कहां से भर गया है। कि जिससे, समाकित, सरीखते पधि नाम की पुस्तक मे, आपने ऐले कडधघृष्ठता, पूर्ण, लुब्चाई ओर लफगेयन से भरे, पूरे, ब अविवेकता से ओत, प्रोत वाक्य लिख मारे । परन्तु अब हमें पता चला, कि सचझुच লী অহ समकित का शह्य आप दी के हृदय भें अटका हुआ था । अस्तु ! आप सर्राखों के लिये यह योग्य ही था, कि आप से या अन्य से, न्याय से या अन्याय से, नीति से या अनीति स, लाचारी से या चरजोरी से, सीघेपन से या कुटिलता से जैले भी होता, उस शल्य का अपने हृदय से खींचना द्वी, आपका पक मात्र लस्य थां । लानत दै स्वाथ खनी इख बुद्धि पर । और चार वार फिटकार हैं ००००० ०० ० ०० ००9 को,




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