श्रीरत्नकरण्डश्रावकाचार | Shri Ratnakarnd Shravakachar

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Shri Ratnakarnd Shravakachar by सदासुखदासजी काशलीवाल - Sadasukhdasji Kaashlival

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पं० सदासुखजीकृत देशभाषामयवचनिकासहित र्वकरंड श्रावकाचार यहां इत ग्न्थदी आदिमे स्यादमादव्िधाके परमेश्वर परमनिग्रथ वीतरागी भ्रीसमन्तमद्रस्वामी जगतके भव्यनिके परमोपकारके अधिं रत्नधयका रशो उपायस्प श्रीरल्नकरंड नाम भराषका- चारङ्‌' प्रकटकरनेके शच्छुक विष्नरदित शाखी समाप्तिरूप फल्‌ इच्छाकरता शष्ट विशिष्ट देवताकू नमस्कार करता ब्त्र कहें हें-- नमः श्रीवद्ध मानाय निद्ध ,.तकलिलात्मने । सालोकानां त्रिलोकानां यद्विया दपेणायते ॥ १ ॥ अथ--श्रीवर्द्धभान तीर्थंकरके अधि हमारा नमस्कार होहु । श्री कहिये भंतरंगस्वाधीन जो অনবন্ধান। अनंतदर्शन, अरन॑तवीयं, अनंतसुखरूप अविनाशीक लक्ष्मी अर बहिरंग इन्द्रादिक देवनिकरि वंदनीक जो समवसरणादिक लक्ष्मी तिसकरि इद्धिकू' प्राप्त होय सो श्रीवद्ध मान कहिये है । अथवा अव-समंतात्‌ किये समस्त प्रकारकरि ऋद्ध किये प्रमश्चतिशयङू' प्राप्त भया है केवलक्तानादिक मान कषये प्रमाण ॒जाका सो बद्धंमान किये । शां ““भवाप्योरघ्ोपः इतस व्याकरणशास्थरङे त्रकरि कारका लोप भया है । कसा कदे भीवदधं मान मिद्धं तकलिल है आत्मा जाका, निद्ध,त किये नष्ट क्षिया है आत्मातें कलिल कहिये ज्ञानवरणादि पापमल जाने ऐसा हे । बहुरि जाकी केवलब्बानविद्या अलोकसद्ित समस्त तीनलोककू' दपणवत्‌ आचरण करे है । भावाथं--जाके केवलत्ञानविधारूप दर्पण बिपें अलोकाकाशसहित परद्रव्यनिका समुदाय- रूप समस्त लोक अपनी भूत, भविष्यत्‌ , वर्तमानकी समस्त अनंतानंत पयोयनिकरि सहित प्रति- बिम्बित होय रहे हैं ऐसा अर जाका आत्मा समस्त कर्ममलरहित भया ऐसा भ्रीवर्दध मान देवाधिदेव अन्तिम तीर्थंकर ताक अपने आवरणकपायादिमलरहित सम्यम्ज्ञानप्रकाशके अर्थि नमस्कार किया | अब आगे धके सरूपकू' कहनेकी प्रतिब्नारूप पत्र फहँ हैंः-- देशयामि समीचीनं, धर्म कर्मनिवहंणम्‌ । संसारवुःखतः ससवान्‌ , यो धरव्युत्तमे सुखे ॥ २ ॥ अथे--मैं जो ग्रन्थकता हूँ सो इस प्रन्थवि्ें तिस धर्मकू' उपदेश करूं हूँ जो प्राशी- निने पश्परिषर्तनरूप संसारके दुःखतें निकाल स्वर्मश्रुक्रेकि दाघारहित उत्तमसुखनि्मैं धारण करे । बहुरि कैसेक धमंकू' कहूँ हूँ जो समीचीन कहिये जामें वादीप्रतिवादीकरि तथा प्रत्यक्ष भजुमाना- दिककरि बाणा नाही भाव, अर ओ क्मेवंषनद न्ट करनेगाला है तिस पर्मकू' कहं हूँ ।




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