जीवन - साथी | Jiivan Saathi

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Jiivan Saathi by सत्यकाम विद्यालंकार - Satyakam Vidyalankar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रेण की रोर पत्र २ {.6६ पऽ 10४८ 00€ 2101067; 107 10৮ 19 (00 200 0০ 19 10৮৪---13101, प्रेम ही ईश्वर है ओर ईश्वर ही प्रेम है । [ स्वतन्त्रता से भी अधिक मुल्यवान--प्रेम का बन्धन; जीवन की बिखरी हुई বাই) আল কই বদ से जीवन में प्ररणा आती है; प्रेम की डोर में बचे दो पंछी; पूखंता न मनुष्य का श्रादश दै न संभव ही दे ] प्रिय कमला, जितनी आसानी से में विवाहित जीवन के साथी की बात लिख गया था, उतनी आसान नहीं थी वह--यह बात मुझे तुम्हारा पत्र मि्तते ही याद आगई। उसमें भी शंकायें हो सकती हैं। तुमने लिखा है-- “विवाद के बाद. स्ली का जीवन गृहस्थी के कार्सो में इतना छल जाता दे कि उसे अपना मानसिक विकास करने का अवसर नहीं मिलता । उसकी अआज़ादी पूरी तरह छिन जाती ই।




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