श्री दसम गुरुग्रंथ साहिब जी | Shri Dasam Gurugranth Sahib Ji

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
44 MB
कुल पष्ठ :
826
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( १४५)केस्वाथ को देखना] श्रेय मार्ग की सिद्धि पर प्रेय तो स्वतःसिद्ध है|
इन्ही श्रेय और प्रेय को श्री गुरूग्रन्य साहिब में गुरमुख শীহ मनमुख कहकर
प्रमात्मपरायणता और सदाचार का अ द्योपान्त उपदेश किया गया है।ज्योति में ज्योति का सचिवेशगुरु नानकदेव महाराज से एक गुरुपरम्परा दशर गुरुमों तक चली ।
अहिंसा और शान्तिके माध्यभसे समाज मे सगठन, भत्मनिभरता भौर
सदैव गुरमुख रहने का भाव उत्तरोत्तर प्रर होता गया । एक गरु के निर्वाण
होते ही उनका दिव्य तेज दूसरे गुरु-कलेवर मे सन्निविष्ट होकर उत्पीड़ित
प्रजा और उत्पीड़क, दोनों ही को ग्रुरमुख मार्ग का सदुपदेश करता रहा।
उत्पीडक शासक अथवा उसके क्षपापात्न भी ग्रुरुओं के चमत्कार के आगे
भनेक अवसरों पर नत हुए । फिर भी नित्य बढते गुरुपरम्परा का प्रभाव
भौर भारतीय समाज मे उत्तरोत्तर सगठन का जागरण देवकर शासन
कठटोरतम होता गया । यहु शान्तरस का. अभियान श्री गुर नानक्देव जी
महाराज, श्री गुरं अगददेव जी, श्री गरु अमरदाप्त जी, श्री गुर रामदास
जीतथा श्री गुर भर्जुनदेव जी महाराज तक चला। गुरु मजुंनदेव जी
महाराज के समय में ही “श्री गुरूुग्रल्य साहिब” का सकलत हुआ । ज्यों
ज्यों गुरु-परम्परा का प्रभाव बढ़ता गया, शिष्यों की संख्या और समाज में
सगठन की वृद्धि उत्पन्न होने लगी, त्यों-त्यो उचके विरुद्ध पड़यत्नकारियो के
कुचक्र भी बढ़ते गये । यहाँ तक कि मुगल बादशाह जहांगीर की अज्ञासेपञ्चम गुरुश्री भर्जुनदेव जी महाराज का बलिदान हुआ ।श्षान्त से वीररस का आविर्भावशहीद होते समय गुरुं अर्जुनदेवं जी महाराज ने शिष्यो गौर समाज
को पहली बार यह उपदेश किया कि परकाष्ठा को पहुँची शान्ति के विफल
होने पर अव शक्ति के उपयोग का अवसर आ गया ।यही से गुरुपरम्परा भौर उनके अनुगत समाजं मे वीररस काभी उदय
हुआ। त्याग और तप के अतिरिक्त खड्ग भी उठा भौर तब से श्री गुरु
ह्रगोविद साहिब, श्री गुरु हरिराय, श्री गुरु हरिक्ृष्ण, अनेको युद्ध एवं छापो
मे। आततायी शासन से मोर्चा लेते, जूझते रहे। नवम गुर श्री तेगवहादुर,
शहीद हुए । |
वीर से रोद्र-रसगुरु सहाराजो की तलवार का लोहा ज्यों-ज्यो प्रखर हो गया,
शासन का जुल्म त्यो-त्यो बढ़ता गया। नवम गुरु श्री तेग़वहाढुर जी के
बलिदान होते ही उनके सुपुत्त श्री गुरु ग्रोविन्दर्सिह ने खुलकर शासन के
विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। रौद्र ने वीररस का स्थान ग्रहण किया ।
विजली के सदृश उन्होंने देश के कोने-कोने मे घृमकर अतीत की वीर-
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