भारत में विवेकानन्द | Bharat Men Vivekanand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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-कोच्भ्यो का व्याख्यान... १७ कोलम्बो का व्याख्यान १५ ।अदमुत नियमावली तथा इसी तरह के और और तत्व --- इन सबके ऊपर प्रतिष्ठित ह। प्रद्नति के सावंजनीन, सावकालिक और सार्वदेशिक विपय ही इन सनातन तावों के आधार हैं। इनके तिवा और मी बहुत-सी गौण विधियों हमोरे श्ञात्रों में दिखाई देती हैं; उन्हीं के द्वारा हमोरे देनिक जीवन के काय स्ताटिति ओर नियमित हेति ६। इन गीण विषयों को श्रृति के अन्तर्गत नहीं मान सकते; ये वास्तव में स्मृति के, पुराणों के अन्तर्गत हैं। 'टनके साथ पृर्वोक्त तलसमृह का कोई सम्पक नहीं है। हमारी आर्यजाति के पंदर भी ये सब बराबर परिवर्तित होते और विभिन्न आकार धारण करते देखे {जति ६। एफ युग के लिए जो विधान हैं, वे दूसरे युग के लिए नहीं होते। इस युग के बाद फिर जब दृश युश आयेगा, तब यह भी दषा आकार धारण करेगा। महामना ऋषिगण आविर्भृत होकर फिर देशकालोपयोगी नये- नये आचार-विधानों का प्रवर्तन करेंगे। जीवातमा, परमासा ओर्‌ ब्र्याण्ड फे ये सव्र अपूर्व, अनन्त, चिततो्ति- श्रेधायक्र क्रम-विकासशील धारणाओं की नींवरूपी जो महान्‌ तत्व हैं वे দা में ही उम्न्न हुए हैं। केवल भारत ही ऐसा देश है; जहाँ के र्गो न जिददे-छोटे देवताओं के लिए यह कहकर छडाई नहीं की है कि ५ मेरा ईश्वर ईच्ा हैं; तग्दारा झूठा; आओ, हम दोनों लड़कर इसका फैला कर ठे । » छोटे छोटे देवताओं के लिए लड़कर फेपला करने की वात केवर भारतवासियों के मुँह से ही कमी सुनाई नहीं दी है। इसका कारण यही है कि हमोरे यहाँ के ये सत्र॒महान्‌ तत्व मनुष्य के अनन्त स्वरूप पर प्रतिष्ठित हैं, औरं इसीलिए वे हजारों वर्ष पहछे के समान आज भी मानव जाति का >ग्राण करने की शक्ति धारण करते हैं| जितने दिनों तक यह पृथ्वी मौजूद रहेगी, कि दिनों तक कर्मफल रेशा, जर तक इम रोग व्यष्टि जीव के सूप भे जन्म ' ऐने कंश, और जब तक हम अपनी शक्ति द्वारा अपना अपना अच्ष्ट बनाते ' “कब्र तक -- उत्तने दिनों तक --- इनकी शक्ति इसी प्रकार विद्यमान रहेगी |




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