भारतीय विदेश नीति के आधार (1860-1882) | Bhartiya Videsh Neeti Ke Adhar (1860-1882)

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Bhartiya Videsh Neeti Ke Adhar (1860-1882) by विषेशवर प्रसाद - Visheshwar Prasad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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1] मध्य एशियाई नोति का सूत्रपात 5 दिशा म मोड दिया । यह अनिवाय भो था क्योकि पूर्वो यूरोप मे फ्ासीसी साम्राज्य के अत और रुसी प्रभुता के उत्थान के कारण एक रूस ही ऐसा यूरोगीय देश रह गया था जो पूर्व -विजय वा रास्ता पवड सकता था। रूस का मध्य एशिया से पुराना सबध था और य पूर्व वी ओर अपने पैर लगातार फैलाता जा रहा था। इससे अंग्रेजा के कान खड हो गए क्योकि वे भारत म अरनी सत्ता की रक्षा म जी-जान से जुटे हुए थे और मध्य एशिया के वाणिज्य से पूरा-ूरा लाभ उठान के अपने इरादे म किसी प्रतियोगो का पूदी आँख भी नहीं देख सकते थे। इसके बाद मध्य एशिया म भ्रभुता पाने के लिए संघर्ष रूस और ब्रिटन म हुआ। भारत पर रूस क हमले का डर निराधार होते हुए भी सच्चा था इसलिए रूसी प्रभुत्व से बीच के जिन एशियाई राज्यो को सुरक्षा भारत की सुरक्षा के लिए आवश्यक समझी गई, भारत और इंगलंड वी জবোহা ন “হমী हौवे से पस्त हाबर उन राज्यों की आर पजे पसार। इस प्रकार तेहरान, हेरात और काबुल भारत त्रिटिश राजनय के प्रमुख अखाड़े बन गए। प्तार्स के विद्द्ध हसी अग्रधपण (यष्ट ८55०0) इस सदो के शुरू से ही चल रहा था। डेंगजेंड के दूत न 1813 में गुलिस्ताँ जी साधि द्वारा अस्थायी समझौता करा दिया था। कुछ साला तक फारस म शाति रही ओर इंग्लैंड का प्रभाव वदता रहा; कितु गाया थे सवाल वो लेवर, जिस पर 1825 म रूस न कब्छा वर लिया था और जिसे राजनय के द्वारा फारस का न दिलाया जा सका था, फारस म लाकमत इतना भड़क उठा कि रूस से लडाई छिड गई। शुरू-शुरू म सफ्लता मिली पर वाद मे फारस की सेना को करारी मुंहरी खानी पडी। फारस न तेहरान वौ सधि वे अधीन्त ब्रिटिश सरकार गे सहायता माँगी, लेविन चूँकि उग নল লিইল আহ ছত্য के बीच शाति थी, इसलिए ब्रिढेन न मदद देन मे आना-कानी की । युद्ध भ फारस बुरी सरह से हारा और उसे 1828 मे सुबंसानचाइ की अपसानजनक सधि करनी पडी । इस सध्ि के अधीन फारस को अपन बुछ उपजाऊ प्रदेश रस के हवाले वर देने पडे, 3,000,000 पौंड की बहुत बडी राशि हर्जान के तौर पर देनी पडे और इसके अलावा उस बुद्ध वाणिज्यिय विशेधाधिकार भी देने पड़े जो एक तरह से रूस ने लिए अपरदेशीय (८७४४४ (६४1110791) अधिकार ये + सादवस का मत हं कि इसवे वाद फारस पूरी तरह स्वतत्न राज्य नही र्हा नौर अन्य यूरोपीय राष्ट्र भी उसकी सोमा म विशेषाधिकार चाहने लगे। अंग्रेडा के दृष्टिकाण से इस सधि का पल यह्‌ हुआ कि तेहरान-दरवार मे उनका प्रभाव घट गया। इस सधि का दूरारा फल यह हुआ कि पूर्वे म पारस की नीति का उद्देश्य यह हा गया कि बह पूर्वी 1 रॉलिस्सन न लिखा हैं, “इस सधि की মল महत्त्वपूर्ण विशयता उसम निहित যত মিতার ঘা লি अगर रूस ने प्रास पर अकारण ही हमला किया, तो प्रेट- प्रिदेन उत्ते भारत विरोधी कार्यवाही सम्रोगा” । सधि वे ्ठे अनुच्टेद म यह्‌ विशेष व्यवस्था थी कि “भले हो ग्रेट ब्रिटेन ओर रूस के बीच शाति हो पर यदि कभी रूस फारस पर आक्रमण करेगा और हमारे सत्प्रयास्रों से भी मतभेद टूर न होगे तो हम शाह की सेना की सहायता ने लिए उपदान देत रहना हागा ३ रॉलिन्मसन ने आये लिखा है, “सच बात यह है कि পিন छठे अनुच्छेद के अधीन हम इस बात के लिए बचनबढ़ हो गए थे वि फारस की रक्षा के लिए हमे रूस स युद्ध भी करना पड অন্ন ই” । पू 37




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